शुभ भावो का सुपरिणाम -शाह मधोक जैन चितरी की कलम से
दिनांक 23 सितंबर को हम अपनी यात्रा के क्रम में प्रातः 3:30 बजे भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली जैनों के अत्यंत पवित्र सिद्धक्षेत्र पावापुरी जी पहुंचे
जहा धर्मशाला में दो घण्टे विश्राम लेने के पश्चात हम श्री दिगम्बर जैन मंदिर में अभिषेक करने हेतु जाने लगे,मेरा 10 वर्षीय बेटा श्रेय जिसको भी अभिषेक में विशेष श्रद्धा रुचि है उसका स्वास्थ रातभर अनुकूल नहीं होने से मेने उसे जगाया ही नही सोचा उसको बाद में मंदिर व निर्वाण स्थली के दर्शन करा दूंगा। व अपने यात्री मंडली के साथ अभिषेक हेतु निकल गए,अभिषेक क्रिया के पश्चात हमने प्रक्षाल वस्त्रों में ही निर्वाण स्थली पदम सरोवर जाकर चरण वंदना की।
उसके पश्चात जैसे ही मैं वापस मंदिर आया वहा श्रेय ने मुझे देखा ओर रोने लगा की आप मुझे प्रक्षाल वस्त्र (धोती दुपट्टा) में क्यों नही ले गए ??
मुझे भी अभिषेक करना था, उसने रोते हुए जिद पकड़ ली की आप मुझे अभिषेक करवाओ ।
किंतु दिगम्बर जैन मंदिर में अभिषेक प्रायः हो चुका था मेने उसे समझाया कि तेरी तबियत सही नही लग रही थी इसलिए नही उठाया पर वो मानने को तैयार ही नहीं था, एक ही जिद की मुझे दोनो (मंदिर व निर्वाण चरण स्थल) जगह पर पक्षाल के वस्त्रों में ले जाकर अभिषेक करवाओ।
फिर मैने मंदिर जी के परिसर में नहलाकर प्रक्षाल वस्त्र पहनाए,मूलनायक भगवान महावीर स्वामी की अलौकिक प्रतिमा के चरणो को स्पर्श कराकर वंदन करवाया,पर उसे तो अभिषेक करना था जो पूर्ण हो चुका था,तभी पुजारी बोला मंदिर के अन्य जिनबिंब का अभिषेक हो रहा है वहा अभिषेक करवालो तो मैने उसको वहा से अभिषेक करवाकर शुद्ध वस्त्रों में पद्म सरोवर निर्वाण स्थली ले गया जहां पद्म सरोवर के मुख्य गेट के अंदर पहुंचते ही सरोवर के तट से एक मजदूर व्यक्ति कमल के फूल लेते हुए आया और बोला की भाई साहब फूल ले लो 10 रु का एक,मेरा बेटा बोला पापा ले लो,चरणो में पूजा करेंगे,मेने कहा एक दे दो,उसने कहा मेरे पास तीन फुल है, तीनो लेलो 20 में दे दूंगा।
हमने 20 रु देकर तीनो कमल के फूल ले लिए और श्रेय को पकड़ा दिए।
पदम सरोवर की वंदना स्थली से चलते हुए जैसे ही बीचों बीच स्थित संगमरमर से निर्मित अत्यंत सुंदर निर्वाण मंदिर पहुंचे तो बेटे के हाथो में कमल के पुष्प देखकर मंदिर के पंडित जी बोले -भाई साहब इस मौसम में कमल के पुष्प यहां पर मिलना,वो भी इस तरह पूर्ण खिले हुए मिलना और तीन मिलना गजब का संयोग है मेने पूछा पंडित जी तीन से क्या ताल्लुक तो उन्होंने कहा की निर्वाण मंदिर में भगवान महावीर स्वामी – गोतम गणधर स्वामी व केवली सुधर्मा स्वामी आदि की तीन चरण छतरिया है।
और उस दिन तीनो पूज्य चरण छतरियो की पूजा कमल के पुष्पों द्वारा श्रेय के हाथो से हुई जिसका लाभ उपस्थित लोगो को भी मिलाऔर श्रेय की शुभ भावना व जिद की वजह से हम सभी बहुत ही सुंदर पूजा से लाभान्वित हुए।
उसी तरह श्रेय ने शिखर जी पर्वत की पावन वंदना में भी इसी संकल्प के साथ वन्दना कि जब तक सभी टोको की वंदना नही होती अर्थात भगवान पार्श्वनाथ निर्वाण टोक के बाद ही जल ग्रहण करूंगा।
एक बार तो भगवान चंद्रप्रभु टोक वंदना के पश्चात मेने उसे बहुत डाटा कि थोड़ा पानी पी ले ,सात घंटे से पैदल चल रहा है थोड़ा सा पानी जरूरी है तो भी नहीं माना औऱ उस दिन हमे थोड़ी जल्दी गति से चलना था क्योंकि 9 बजे के लगभग श्री पार्श्वनाथ भगवान के टुक से आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी का पारणा होना था। जिसको प्रत्यक्ष अपनी आखों से देखने के प्रमुख उद्देश्य के साथ मैं शिखर जी आया था। इसलिए जब मेने श्रेय को ज्यादा डाटा तो वह नाराज होकर वापस नीचे की ओर चला गया। लगभग आधा किलोमीटर वापस जाकर उसे समझा कर लाया की ठीक है मैं जिद नहीं करूंगा तू पार्श्वनाथ टोक के दर्शन के बाद ही पानी पीना,पर अब मुझे ये लगने लगा की श्रेय की वजह से आज देर हो गई है और मैं अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के पडगाहन पारणे को देखने से वंचित रह जाऊंगा।
लेकिन सौभाग्य से ही उसी दिन आगे उसको आचार्य श्री प्रमुख सागर जी के साथ टोको की वन्दना करने मिली । पार्श्वनाथ जी के टोक पर पहुंचते ही अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी का पडगाहन -पारणा व अत्यंत निकटता से आचार्य भक्ति,मुनि श्री पुण्य सागर जी सहित अनेक साधु भगवंतो के दर्शन का लाभ मिला।
जो न भूतो न भविष्यति है
शब्द सुमन -शाह माधोक जैन चितरी
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
