हम उसे भली भांति समझ ले जिसके साथ हमें अपना जीवन जीना है सुधासागर जी महाराज
ललितपुर
अभिनंदनोदय तीर्थ पर दैनिक प्रवचनों की श्रंखला में पूज्य निर्यापक संत मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज ने कहा हम उसे भली भांति समझ ले जिसके साथ हमें जिंदगी बितानी हैं। उसके बाद ही अन्य किसी व्यक्ति या वस्तु को समझने का प्रयास करना,,जैसे कोई आपसे पूंछे की कहा से आये हो तो एकदम से नही बताना। पहले सोचना समझना, फिर बताना कहा से आये हो। और यह तो कभी मत कहना कि माँ के गर्भ से आया हु। क्योंकि यह बात आपको बतायी गयी हैं। आप उसे जानते नही हैं अतः उसे सिर्फ वही बताना जो आप जानते हैं,।,, हमे यदि स्वयं को जानना हैं तो किसी नाम की जरूरत नही। लेकिन यदि दूसरे को हमे पहचानने की जरूरत हो तो नाम की जरूरत होगी।
पूज्य मुनि श्री ने कहा संसार के सभी जीव आंखों से देखते हैं लेकिन गजब की बात तो यह हैं कि आचार्यो द्वारा जितनी भी कथाएं लिखी गयी हैं वह बगैर देखें लिखी गयी हैं ,,एक उदाहरण बतौर गुरुदेव ने सभी स्नातकों से कहा कि आप बताये कि आप कहा से आये हैं और जब सभी ने बताया कि हम अपने गाँव से आये हैं और जब पूछा की वह स्थान कैसा है तो सभी ने कहा बहुत अच्छा तब गुरुदेव कहते हैं कि अगर आपका गाव बहुत अच्छा है तो फिर यहां आए क्यों हो और अगर यहां आए हो तो यह पक्का हैं कि यह स्थान उससे अच्छा है,,, अब दूसरा प्रश्न कि आप जिस के साथ रहते हैं वह कैसे है? और यदि आपका जबाब अच्छे में हैं तो फिर यह बताओ कि गुरु के पास क्यों आये यानि यह बात तय है कि हमें गुरु के पास आने पर जो खुशी मिल रही हैं वह पहले वालो के पास नही थी। इसका आशय है गुरु श्रेष्ठ हैं।
एक संस्मरण के माध्यम से गुरुदेव ने कहा की एक दीक्षार्थी ने अपनी माँ से कहा कि में दीक्षा लेना चाहता हूं तो उसकी माँ ने कहा बेटा क्यों तो दीक्षार्थी बोला में जिनवाणी मा की शरण मे जाना चाहता हूं। तो माँ ने कहा में तो हू तेरी मा और मैने तुझे पालने पोसने में कोई कोर कसर कहा छोडी हैं जो तू मुझे छोड़ने तैयार हो रहा हैं,?, तेरे पिता हैं, उन्होंने भी तुझे राजकुमारों सा पाला हैं। तब दीक्षार्थी कहता हैं मा में जो हु तुम उसकी माँ नही हो ।
और तुम जिसे अपना बेटा मान रही हो वह में हु ही नही।मुझे पता चल गया हैं कि मेरे जीवन को सफल बनाने में जिनवाणी माता ही सहायक हैं। वही हैं जो मुझे मुक्ति दिला सकती हैं। और पिता जी का वेभव भी मेरे किसी काम का नही क्योंकि में चैतन्य आत्मा हूं।
कुंडलपुर में रहते हुए आचार्य भगवान पहिले सीधे जाकर बड़े बाबा के मंदिर जाते फिर जंगल जाकर किसी भी मन्दिर में बैठ जाते थे उस दिन आचार्य श्री जी ने पास के एक मंदिर में ही पिच्छी लगाई और जमीन पर बैठ गए और सभी महाराजो को पुस्तक लाने की कह दिया। उस दिन एक बहुत बड़े संत जिनका नाम अमरनाथ था वो आचार्य भगवान की वंदना करने पहुचे उनका स्वयं का वैभव इतना था कि उनके चलने के पहले सड़के साफ होती थी। चमर ढुराये जाते थे। सोने के जेवरातों से सजे पड़े थे।और जैसे ही उन्होंने गुरुदेव को देखा स्तब्ध रह गए। और बोले कि दुनिया का इतना बड़ा संत होकर भी कोई कैसे जमीन पर अकेला बैठ सकता हैं। और आनन्द मना सकता हैं।बस इतना कहते ही चरणों मे लोट गया। और बोला कि मैने सुना था कि भगवान हैं लेकिन आज मैने भगवान देख लिया।
एक ज्योतिषी अपनी विद्या में पारंगत होकर वापिस जा रहा था रास्ते मे उसे पैर के निशान दिखे जिन्हें देखकर उसे लगा कि यह तो चक्रवर्ती के पैर होना चाहिये किन्तु यह अकेले क्यों दिख रहे हैं जबकि चक्रवर्ती के साथ तो हजारो सैनिक सुरक्षा में रहते हैं और वह उन निशानों का पीछा करते हुए वहां पहुच गया जहां तीर्थंकर प्रभु साधना कर रहें थे। उसने कहा कि आपके पैरों को देखकर तो लगता हैं कि आप चक्रवर्ती होना चाहिये। मगर आप तो अकेले बैठे हैं वह भी सादा कपड़ो में,,, मेरा ज्योतिष तो बेकार हो गया। तब तीर्थंकर प्रभु ने बताया कि तुम्हारी ज्योतिष सही हैं लेकिन मैंने वह सारी सम्पदा इसलिये छोड़ दी कि उसमें आनंद नही था। और जिसमें आनंद हैं वह उस अवस्था मे रहते हुए नही मिल सकता।
श्रीश ललितपुर से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
