प्रकृति का विशेष ज्ञान विज्ञान है कनकनदी गुरुदेव

JAIN SANT NEWS भीलूड़ा

प्रकृति का विशेष ज्ञान विज्ञान है कनकनदी गुरुदेव

भीलूड़ा

स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने बताया कि प्रकृति का विशेष ज्ञान विज्ञान है। काल, समय, प्रकृति का ध्यान रखते हुए विशेष ध्यान पूर्वक आहार देना, उपकरण देना विज्ञान हैं। ज्ञान आत्मा का स्वभाव हैं। “knowledge is supreme light”जिस आहार से राग, द्वेष, मद, भय,असंयम,रोग,दुख
उत्पन्न ना हो ऐसा सुतप के लिए आहार देना चाहिए। आहार सुतप स्वाध्याय बढ़ाने के लिए दिया जाता है। काल के सामर्थ्य अर्थात किस ऋतु में कौन सा आहार योग्य है उसके अनुसार, पात्र की प्रकृति वात पित्त कफ के अनुरूप आहार देना चाहिए।

जिस प्रकार जहाज में रत्न भरे हुए होने पर उसे संभाल कर धीरे से समुद्र पार कराना चाहिए नहीं तो रत्न समुद्र में बिखर जाएंगे तो एक भी प्राप्त नहीं होगा उसी प्रकार साधुओं का शरीर भी रत्नत्रय का भंडार हैं।

जो अनिष्ट कारक हो साधुओं के लिए अयोग्य हो ऐसा आहार नहीं देना चाहिए।हम जैसा भोजन करते हैं उसी के अनुसार शरीर में रस, न्यूरॉन ब्रेन तक पहुंचता हैं। प्रदूषण में रहने से गर्भ मे रहने वाले भ्रूण का ब्रेन डैमेज हो जाता है।विजयलक्ष्मी गोदावत ने बताया कि आचार्य श्री के पास पढ़ने से पहले हमें किस प्रकार का भोजन कैसे करना चाहिए वह नहीं जानते थे। 2007 में आचार्य श्री के चतुर्मास में इसके बारे में विशेष ज्ञान हुआ। अधिकांश रोग सही भोजन नहीं करने से होते हैं। आचार्य श्री का आहार ही औषधि हैं। हमें भी आहार में विशेष ध्यान रखने के लिए कहते हैं। आचार्य श्री आहार दान में हाथ धोने के लिए बार-बार प्रेरित करते थे तब उनके विज्ञान को कोई समझ नहीं पाता था आचार्य श्री ने जब से दीक्षा ली है तब से कपड़ों को , शरीर के किसी भी अंग उपांग में हाथ लगाने पर हाथ धुलवाते हैं। गरम मसालों का, हल्दी का भी अधिक प्रयोग करते हैं। ड्राई फ्रूट्स दूध सब्जीया अधिक लेते हैं रोटी अति कम लेते हैं। जब कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा तब आचार्य श्री को सभी समझ पाए। मैं अर्थात आत्मा का ज्ञान नहीं होने से धर्म को सही नहीं समझ रहे थे। आचार्य श्री ने नदौड में बताया था कि हम मैं की जगह हम का प्रयोग अपने स्वयं के दोष छुपाने के लिए करते हैं। मैं कहने से स्वयं का दोष प्रकट हो जाएगा इस डर के कारण हम का प्रयोग करते हैं जिससे हमें दोष लगता है दूसरा इसके लिए दोषी नहीं हो तो भी हम उसको दोष का भागीदार बना देते हैं। आचार्य श्री आध्यात्मिक आत्मा के अर्थ में मैं का प्रयोग करते थे। उसको सब विपरीत समझते थे क्योंकि सभी मिथ्या दृष्टि होने के कारण शरीर को ही मैं मानते थे आत्मा का कोई ज्ञान नहीं था। केवल रूढ़िवादिता से ही धर्म करते थे। पुनर्वास कॉलोनी की टीना शर्मिला यशवंत आदि में भी इस विषय से संबंधित अपने अनुभव बताए।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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