ग्वालियर का दिगंबर जैन स्वर्ण मंदिर भव्यता लिये हुए है
ग्वालियर
जब हम तीर्थ क्षेत्रो का अवलोकन करते है तो एक बात सार्थक सिद्ध होती जैन दर्शन काफी प्राचीनता लिये हुए है ऐसे ही जिनालय का मेने दर्शन किये देख मन गदगद भाव विहल हो जाता है हमारे पूर्वजो ने हमारी धरोहर को सुरक्षित रखा यह स्थान है दिगम्बर जैन स्वर्ण मंदिर ग्वालियर हा जो भव्यता लिये हुए है इस मंदिर एय इतिहास पर गोर किया जाए तोइस मंदिर का निर्माण भादवा सुदी 2 संवत 1761 मे हुआ कहा जाता है इसकी पूर्णता होने पर 45 साल का समय लगा
2 मण सोने का उपयोग किया गया




इस मंदिर के निर्माण मे उस समय के समाज के प्रमुख जन कुशल कारीगरों वास्तुविदोने अपना तन मन धन इसमे समर्पित किया उस समय मंदिर निर्माण मे 2 मण सोने का उपयोग किया गया जो इसकी स्वर्णकला को निखारता है व इसी कारण जिनालय अभिभूत कर देता है व मनमोहक लगता है जिनालय मे मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ है जो संवत 1861 से विराजित है वर्तमान मे जिनालय मे 163 प्रतिमाये है जो विभिन्न रत्नों की चांदी मूंगा स्फटिक मणि स्लेट पाषाण





कसोटी संगमरमर एवम श्याम सफ़ेद वर्ण की है यह 1 इंच से लेकर 5 फीट 6 इंच की अवगाहना लिये हुए है यह खडगासन व पद्मासन प्रतिमा विराजमान है व त्रिकाल चोबिसी विराजमान है मंदिर जी मे कुल सात वेदिया व कलापूर्ण समवशरण जो अभूतपूर्व है इसमे जो स्वर्ण चित्रकारी का काम है व कलाविज्ञ कलाकारों के द्वारा स्वर्ण की कलम से बहुत ही बारीकी से किया है जो सभी को आकर्षित करता है मंदिर जी के गुम्बद के भीतरी भाग मे स्वर्ण कारीगरी एवम खम्बो पर कांच की जडाई का काम देखते ही बनता है ख़ास बात यह है की असली नगीनों को प्राकृतिक रूप से तैयार कर इसमे विभिन्न रंगों का उपयोग किया है यह अत्यधिक आकर्षक कलापूर्ण एवम अलोकिक है जो अन्यत्र कही भारतवर्ष मे शायद देखने को न मिले
मंदिरजी के मध्य विशाल चोक चोक के मध्य दो विशाल दीवारे जिनमे स्वर्ण जडित एवम प्राकृतिक रंगों का विशेष उपयोग किया गया है इसमे दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्रो की पोरोणिक कथाओ एवम तीर्थंकर भगवान के पांचो कल्याणको का विवरण करते हुए चित्रण बड़ी मनोज्ञता के साथ दर्शाया गया है मन्दिर जी मे एक विशाल सरस्वती भवन है जोअपने आप मे विशालता को लिये हुए है इस मन्दिर की चित्रकारी नक्काशी सभी को आकर्षित कर देती है व मन को बार बार देखने की और आकर्षित करती है इस मन्दिर की बायीं और हम चलते है तो तीर्थंकरो के जन्म से पूर्व माता को आए 16 स्वप्नों का एवम दुसरे द्वार पर पंचमकाल की शुरुआत मे चन्द्रगुप्त मोर्य के 16 स्वप्न जो पंचमकाल मे हो रहे परिवर्तनों का सूचक है जिसका चित्रण बडे ही भावपूर्ण तरीके से किया गया है जो सजीवता को दर्शाता है इस जिनालय पर जितना लिखा जाए शब्दों की सीमा असीमित सी हो जाती है समवसरण मे विराजमान मूलनायक पार्श्व प्रभु की छटा अद्भुत एवम निराली है यश प्रतिमा अलग अलग रंगों मे दिखाई पड़ती है यहाँ देवी देवता भी दर्शन को आते है
जन श्रुति मंदिर जो लेकर एक जनश्रुति प्रचलित है जो कोई शुद्ध मन वचन काय से भक्तिपूर्वक चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान् का दर्शन करता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है आत्मा के भाव उज्जवल होते ही मन मे एकाग्रता बढती है और मन भाव विभोर हो जाता है यह जिनालय हमारी समाज एक धरोहर के रूप मे है इस हेतु हमे सहयोग करते रहना चाहिए ताकि यह धरोहर बनी रहे अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क कर सकते है
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अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
