पुरुस्कार में मिली कोई भी वस्तु को बेचना नही फेकना नही सुधासाग़र महाराज
ललितपुर
पूज्य गुरुदेव सुधासागर महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा की कुछ नीतियां बनाई गयी हैं जो सर्वथा सत्य हैं, जैसे आग के कुंड से कभी पानी नही निकल सकता, अंधा व्यक्ति कभी रंग नही बता सकता, गरीब व्यक्ति किसी अमीर को पैसा नही दे सकता,,,
उन्होंने विस्तार रूप देते हुए कहा कि
जैसे प्रकृति ने हमें अनाज दिया वह प्रकृति का उपहार था लेकिन उसके मूल्य का निर्धारण करके व्यापारी ने उसे बेच दिया तो यकीन मानिये वह पाप हैं।
जानकारी देते हुए श्रीश जैन ललितपुर ने कहा की गुरुदेव ने कहा कि पुरुस्कार में मिली हुई कोई भी वस्तु फेकना नही बेचना नही और न ही किसी अन्य को देना ,, आपको आपके किये गए किसी बड़े कार्य के लिये भले ही एक छोटा सा पुरुस्कार मिले फिर भी उसकी कभी उपेक्षा नही करना,,। एक बहुत ही अद्भुत राज का खुलाशा करते हुए कहते हैं कि यदि आप किसी के दिये हुए छोटे से छोटे उपहार का सम्मान करते हैं तो निश्चित मानिये एक समय ऐसा आएगा कि सारी दुनिया के लोग आपका सम्मान करने आतुर होंगे भेंट ही भेंट देंगे क्योंकि नियम हैं पैसा पैसे को खीचता हैं उसी प्रकार उपहार भी उपहार को खीचेगा।
भेंट किसे दी जाए और लौटाए कौन जब इस बात की चर्चा हुई तो पूज्यवर ने कहा कि जरूरी नही बड़ा आदमी भेंट लौटाए , भेंट तो केवल बराबरी और छोटे लोगों द्वारा ही लौटाई जा सकती हैं। जैसे हम भगवान के चरणों मे द्रव्य भेंट कर आते हैं तो जरूरी नही कि भगवान आपको भेंट वापिस देवे। शास्त्रो में लिखा है कि एक बाप अपने बेटे के लिये जिंदगी भर जो भेंट देता हैं उसके बारे में कहा गया हैं कि बेटा को उसे लौटाना ही होगा लेकिन जब भी कोई बेटा अपने बाप को भेंट दे तो कोई जरूरी नही हैं कि बाप उसे अपने बेटे को वापिस करें
सामान्यतः एक चांदी का कलश जो बाजार में मात्र एक लाख का मिल जाता हैं उसे बोली बोलकर 1 करोड़ में ले जाने वाला खुश होता हैं तब आश्चर्य होता हैं कि यह व्यक्ति लुटने के बाद खुश हो रहा हैं नाच रहा हैं जब इस बात के मूल में पहुचते हैं तो पाते हैं यह कलश की नही भक्ति की न्योछावर हैं और जब लक्ष्मी इस न्योछावर को देखती हैं तो अपने आप भंडार भर देती हैं। बल्कि कई गुना कर देती हैं।
गुरुदेव ने कहा ह जब भी कोई धार्मिक कार्य करने का अवसर मिला तुरन्त अपने आपको धन्यवाद कहना कि यह कार्य करने का अवसर तुम्हे मिला अपने भाग्य को सराहना,,,, मजदूर अपने कार्य को करते हुए पसीना बहाता हैं शरीर को गंदा करता हैं अथार्त वह गन्दगी में रहते हुए कमाई करता हैं और उसी का परिणाम हैं कि उसके भाव भी गन्दे होते हैं और जब व्यक्ति एक नंबर का कार्य करता हैं चिंताएं नही रहती उसमें पसीना नही आता बस बैठे बैठे व्यापार करना होता हैं मन सुखी रहता हैं तब जो पैसा आता हैं वह पूण्य के कार्यो में लगती हैं तभी नब्वे प्रतिशत मजदूर अच्छे भाव नही रखता वह व्यसनों में पैसा उड़ा देता हैं जबकि एक नंबर का पैसा भावो को ही नही लक्ष्मी को भी बढ़ाता हैं वह दान करने के भाव करता हैं और उत्तरोत्तर प्रगति करता हैं।
श्रीश ललितपुर से प्राप्त जानकारी
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
