पूज्य मुनि श्री संभवसागर महाराज सानिघ्य में आयुर्वेदिक शिविर का हुआ आयोजन

JAIN SANT NEWS खुरई

पूज्य मुनि श्री संभवसागर महाराज सानिघ्य में आयुर्वेदिक शिविर का हुआ आयोजन

खुरई

–गांधी जयंती के मंगल प्रसंग पर मंगल धाम में निशुल्क शिविर का आयोजन हुआ। इस भारत सरकार की नीति आयोग की सदस्य श्रीमती अर्चना जैन ने आकर अपना उदबोधन दिया व पार्षदों व चिकित्सकोका सम्मान किया गया।

मंगलधाम में आयोजित आयुर्वेदिक शिविर से पहले मुनिश्री ने उद्बोधन दिया उन्होंने कहा कि मनुष्यको निरोगी काया रखने के लिए संतोषी प्रवृत्ति को अपनाना होगा। बड़े राष्ट्र और उनके नेता अहिंसाशांति और एकता की बड़ी-बड़ी चर्चा करते हैं परन्तु उन्हें वह सब नही मिलती क्योंकि जीवन में उनका आचार, विचार और आहारठीक नहीं है। जब तक यह तीनों ठीक नहीं होंगे तो जीवन मेंसुख, शांति, एकता की बात करनाकेवल कोरी कल्पना होगी।अथवा स्वप्न होगा।

उन्होनें कटाक्ष किया कहा की नेताओ को अहिंसा सेबस इतना ही नाता है कि केवल दीवारों पर नारे लिखे जाते हैं। दिवाली पर पुत जाते है। उनके जीवन में स्वयं आचार, विचार और आहार प्रकृति के प्रतिकूल है। आहार का संबंधहमारे अंतरंग और बहिरंग जीवन सेहै। हम जैसा आहार करते हैं, वैसा हीहमारा विचार होता है। हमारे विचारोंका संबंध आंतरिक जीवन से है। पूज्य मुनिश्रीगांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री कीजयंती पर आयुर्वेदिक शिविर को सबोधित कर रहे थे। आहार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारा आहार बाह्य जीवन से संबंध रखता है।

हमारा आहार पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, संसार-मोक्ष से संबंध रखता है।

अतः आहार ही हमारे जीवन में स्वर्ग मोक्ष, अहिंसा, सुख-शांति,धर्म आदि को देता है। शरीर आत्मा से पृथक है। आत्मा अविनाशी है।शरीर विनाशी है। शरीर को आत्मा से अनंत काल के लिए पृथक किया जा सकता है।

एक बार आत्मा सूक्ष्मआदि शरीरों से भी पृथक हो जातीहै तो वह पुनः संसार में नहीं आती।

वह अरूपी परमात्मा बन उर्ध्व लोकमें रहती है। आहार के तीन भेद होतेहै- सात्विक, राजसिक, तामसिकसात्विक सुपाच्य जीवन हिंसासे रहित, स्वास्थ्यप्रद, शांतिदायकन्याय नीतिपूर्वक उपार्जित औरतृप्ति कारक होता है। ऐसा आहारसात्विक आहार कहलाता है। वह शाकाहार ही होता है। राजसिकगरिष्ट, मादक, चटपटा मसालेदार राजसिक आहार कहलाता है। तामसिक कामोत्तेजक, रोगोत्पादक, हानिकारक, क्रूरता उत्पादक, भारीबुद्धिनाशक आहार तामसिंक आहारकहलाता है। इन तीनों आहारों मेंमानव के लिए सात्विक आहारही अर्थात शाकाहार ही श्रेष्ठ है|

उन्होंने कहा कि शाकाहारी औरमांसाहारी प्राणियों की तुलना करनेपर वैज्ञानिकों ने पाया कि दोनों की शारीरिक संरचना में बहुत अंतर है।मांसाहारी प्राणियों के दांत नुकीले होतेहैं, जबकि शाकाहारी प्राणियों के दांतचपटे होते हैं। मांसाहार दो इंद्रिय सेलेकर पांच इंद्रिय प्राणियों के बध से होता है जिस वस्तु का जन्म ही हिंसासे हुआ हो उसका अहिंसक प्रवृत्तियां कैसे हो सकती है। जिसका खानपान सुधरा है उसका जीवन सुधरा है। शाकाहारी पहले खाते हैं, फिरपीते है। मांसाहारी पहले पीते हैं फिरखाते हैं। जो साक्षर होकर भी राक्षसहैं वह मनुष्य होकर भी पशु है। सभीउल्टे चलते हैं। वह तुलना, सेठ यासज्जन से न कर हिंसक पशु से करतेहैं, कहते हैं कि सर्प, सिंह, बिल्ली,कुत्ता आदि ईश्वर प्रकृति प्रदत्त है।यह अन्य प्राणियों को मारकर उदरपूर्ति करते हैं। उन्हीं के समान हम भीईश्वर प्रदत्त है। अतः हमें भी उन्हीं केसमान पशु को मारकर खाना चाहिएऐसा कहने वाले मनुष्य, स्वयम् की पशु से तुलना कर, अपने आप कोपशु सिद्ध कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इसमें गलतीउन जीवात्मा की नहीं, बल्कि उनके
द्वारा लिए गए उस मांसाहार कीहै। जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा
मन, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक,वैज्ञानिक, शाकाहारी, मानसिक,
बौद्धिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य आदिदृष्टि से शाकाहार श्रेष्ठ है। स्वस्थ्य
और जिंदा रहने के लिए भोजन कियाजाता है। जो अपनी मौत का औरदूसरे जीवों के मुर्दा करने में कारणहोने से मांसाहार ग्रहण करना मूर्खताहै। निरोगी काया के लिए हमें संतोषीप्रवृत्ति को अपनाना होगा। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा रोगी मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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