
सनावद। भगवान महावीर ने हमें आत्म कल्याण के लिए दस धर्मों के दस दीपक दिए हैं। प्रतिवर्ष पर्युषण आकर हमारे अंत:करण में दया, क्षमा और मानवता जगाने का कार्य करता है। जैसे हर दीपावली पर घर की साफ-सफाई की जाती है, उसी प्रकार पर्युषण पर्व मन की सफाई करने वाला पर्व है। इसीलिए हमें सबसे पहले क्षमा याचना हमारे मन से करनी चाहिए। जब तक मन की कटुता दूर नहीं होगी, तब तक क्षमावाणी पर्व मनाने का कोई अर्थ नहीं है। अत: जैन धर्म क्षमा भाव ही सिखाता है। हमें भी रोजमर्रा की सारी कटुता, कलुषता को भूल कर एक-दूसरे से माफी मांगते हुए और एक-दूसरे को माफ करते हुए सभी गिले-शिकवों को दूर कर क्षमा पर्व मनाना चाहिए। सन्मति जैन काका ने बताया कि क्षमा वाणी के अवसर पर प्रति वर्ष की तरह सर्वप्रथम आदिनाथ जिनालय, उसके बाद सुपार्श्वनाथ मंदिर एवमं अंत में पार्श्वनाथ जैन बड़ा मंदिर में परम्परानुसार श्रीजी का अभिषेक किया गया। सभी समाजजनों ने भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर क्षमा याचना की और फिर एक-दूसरे से हाथ जोड़कर गले मिलकर क्षमा याचना की।
