स्वयं में रमना, स्वयं में उतरना, स्वयं में खो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है। प्रसन्न सागर महाराज

JAIN SANT NEWS सम्मेद शिखर

स्वयं में रमना, स्वयं में उतरना, स्वयं में खो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है। प्रसन्न सागर महाराज

पारसनाथ

शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ की पावन धरा पर पर्युषण पर्व के अंतिम दिवस उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर आचार्य 108 प्रसन्न सागर जी महाराज जो लंबे समय से पारसनाथ पर्वत स्थित स्वर्ण भद्र टोंक की गुफा में तप व साधना में तल्लीन हैं। मौन व्रत के साथ-साथ सिंघनिश्किडित व्रत कर रहे हैं के द्वारा उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर श्रद्धालुओं को संदेश भिजवाया है। आचार्य महाराज द्वारा ब्रह्मचर्य धर्म को लेकर बताया गया है कि नजर व नियत को संभालना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करना कहलाता है। स्वयं में रमना, स्वयं में उतरना, स्वयं में खो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है।ब्रह्मचर्य धर्म यानी लक्ष्मण रेखा को खींचना ब्रह्म के समान चर्या ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य जैसी कठिन साधना सिर्फ और सिर्फ मन को साधने से ही सम्भव है।

चेतना की भूख परमात्मा से मिलाती है। मन और शरीर का भूख 96 हजार रानियां को मिलने के पश्चात भी नहीं मिटती। आचार्य महाराज कहते हैं इसलिए अपने शरीर की ऊर्जा को-काम में नहीं, राम में लगाएं। भोग में नहीं योग में लगाएं। संसार में नहीं, साधना में लगाएं। वासना में नहीं, प्रार्थना में लगाएं। सरकार परिवार नियोजन की चिंता करती है और धर्म पाप नियोजन की चिंता करती है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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