ललितपुर। श्री अभिनन्दनोय तीर्थ प्रांगण में एलक श्री गम्भीर सागर जी महाराज ने सांयकालीन धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि उत्तम आकिंचन्य का अर्थ है कि किंचित मात्र भी हमारा कुछ नहीं है क्योंकि कल हमने त्याग किया था और त्याग करने के बाद कुछ नहीं बचता। आज का दिन कहता है कि अंदर और बाहर से खाली हो जाओ अर्थात समस्त परिग्रहों का त्याग करना ही अकिंचन्य धर्म है। आज भी कुछ त्यागी साधु-संत ऐसे होते हैं, जो परिग्रह सहित होते हैं। ऐसे में उनके जीवन में अकिंचन्य धर्म कभी नहीं आता। त्याग तो वह है कि जिस वस्तु का त्याग किया है, उसका खयाल भी नहीं आए। लेकिन जब व्यक्ति अंदर से प्रसन्न होकर किसी प्रिय वस्तु का त्याग करता है तो वह बहुत खुश होता है और उसके जीवन में आकिंचन्य धर्म आ जाता है। जैसे दूध तपाना है तो भगोनी को तपाना जरूरी है। इसलिए आत्मा को पवित्र बनाना है तो शरीर को थोड़ा सा तपाना पड़ेगा और जब शरीर तपेगा तो उसमें से कुछ त्याग भी होगा और फिर आकिंचन्य भी आएगा। आज के परिवेश में टूटते परिवारों को उन्होंने संदेश दिया कि आज आपका सबसे करीबी कोई बाहरी व्यक्ति होगा, वह आपके काम कभी नहीं आएगा। यदि आपके साथ कुछ भी होता है तो जरूरत के समय सबसे पहले आपके परिवार के सदस्य काम आते हैं। इसलिए छोटी-छोटी बातों पर लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पंचम काल में व्यक्ति को जीने के लिए काफी पुण्य चाहिए, पुण्य के बिना जीवन जीना संभव नहीं है। आप अपने आप में पुण्य का संचय करें। अपने जीवन को इतना पवित्र बनाओ कि आकिंचन्य धर्म स्वत: ही आपके जीवन में आ जाए। आज के व्यक्ति की मानसिकता ऐसी है, जैसे भगवान के शिखर पर बैठे हुए कौए की होती है। जब मंदिर के शिखर के सामने से इंसान गुजरता है तो मंदिर के शिखर को देखकर वह प्रणाम करता है, लेकिन शिखर पर बैठा हुआ कौआ समझता है कि यहां से गुजरने वाले लोग उसे प्रणाम कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कभी भी आकिंचन्य धर्म नहीं आ सकता। आकिंचन्य धर्म सब कुछ त्याग करने के बाद आता है। श्रद्धालुओं को समझाते हुए महाराज ने कहा कि जिन्हें तुम अपना समझ रहे हो, उनमें से तुम्हारा अपना कोई नहीं है। तुम्हारा अपना जो है, वह हैं जिनेंद्र भगवान। अरिहतें शरणम पवज्यामि, सिध्दे शरणम पवज्ज्यामि, साधु शरणम पवज्ज्यामि, केवलीपड्डत्तो धम्म शरणम पवज्ज्यामि, इसके अलावा दुनिया में और कोई शरण नहीं है। आप कुछ समय के लिए अकेले में बैठें और विचार करें कि हम कहां से आए है, हमें कहां जाना है और इस दुनिया में हमारा कौन है । यदि यह विचार सफलता से कर लिया और इसका उत्तर ढूंढने में सफल हो गए, तो तुम्हारा जीवन सार्थक होगा और आगे का रास्ता भी साफ होगा। क्योंकि आप अकेला अवतरे….मरे अकेला होय, यूं कबहुँ, इस जीव को साथी सगा न कोय। इसलिए अपने जीवन को आकिंचन्य बनाने का प्रयास करिए, जिससे मोक्षमार्ग का रास्ता प्रशस्त हो सके। इसके लिए आपको इस पर भी विचार करना पड़ेगा कि जहां देह अपनी नहीं, तहां न अपना कोय।
