धारियावाद । महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित दसलक्षण महापर्व के तहत शनिवार को प्रवचन में आर्यिका प्रश्न मति माताजी ने कहा कि उपयोग के लिए पूरी जिंदगी कमाते हैं। जितना लाभ होता है, उतना लोभ बढ़ता है। रात दिन कमाने के बावजूद व्यक्ति अंतराय कर्म के उदय के कारण उसका उपयोग नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि दसलक्षण महापर्व के चौथे दिन त्याग करने का दिन है। धर्म में क्रोध के अभाव में उत्तम क्षमा, मांग के अभाव में उत्तम मार्दव, माया के अभाव में उत्तम आर्जव, लोभ के अभाव में उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है। माता जी ने कहा कि हम बाह्य वस्तुओं में इतने उलझे हुए हैं कि आत्मा से परमात्मा बनने का पद भूल गए हैं। माताजी ने जीवों की चारों गतियों का वर्णन करते हुए बताया कि हमारी आत्मा में कर्मरूपी काली मां लगी हुई है। कर्म रूपी कोयले को ज्ञान रूपी अग्नि में जलाना होगा जिससे हमारी आत्मा पापरहित होकर स्वच्छ और निर्मल होकर शुद्ध श्वेत पवित्र हो जाएगी। हमारी आत्मा पापरहित होकर स्वच्छ और निर्मल होकर शुद्ध श्वेत पवित्र हो जाएगी। लोभ सभी पापों का राजा कहलाता है। हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह सभी पाप लोभ कषाय से ही आते हैं। लोभ से मुक्ति पाना उत्तम शौच धर्म कहलाता है। यह जानकारी श्रीफल परिवार के समन्वयक धर्मेन्द्र जैन ने दी है।
