रेवाड़ी। परम पूज्य आचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने दशलक्षण महापर्व के अवसर पर अतिशय क्षेत्र नसिया जी में आयोजित श्री तीस चौबीसी महामण्डल विधान में धर्म के चतुर्थ लक्षण “उत्तम शौच” की व्याख्या करते हुए कहा कि शुचिता अर्थात् पवित्रता का नाम है शौच, जो कि लोभ कषाय के अभाव में प्रकट होता है। लोभी, लोभ के कारण पाप कर बैठता है और अपना जीवन नष्ट कर लेता है। हमारे आत्मिक विकास में लोभ-कषाय एक विशाल पर्वत के समान बाधक हैं। इसलिए हमें उत्तम शौच धर्म को अपनाकर अपने जीवन में शुचिता लानी चाहिए। शौच के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। इसीलिए सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली पवित्रता ही उत्तम शौच धर्म है। शौच धर्म की विरोधी लोभ कषाय मानी गयी है। लोभ को पाप का बाप कहा जाता है, क्यूंकि संसार में ऐसा कौन सा पाप है जिसे लोभी नहीं करता हो।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि पवित्रता का जो भाव है, निर्मलता का जो भाव है, स्वाभाविकता का जो भाव है, वही शौच धर्म है। जहां लोभ का अभाव होता है, वहीँ शौच धर्म है। पांचों इन्द्रियों के विषय और मन तथा चारों कषाय के विषयों की पूर्ति का लालच ही लोभ कहलाता है और यह देवगति में सर्वाधिक पाया जाता है। सभी कषायों का जनक लोभ होता है। लोभ की अभिव्यक्ति नहीं हो पाती क्योंकि यह अंडरग्राउंड रहता है, बाकी कषायों का पोषण करता रहता है। लोभ का विसर्जन करे बिना धर्म का अर्जन नहीं हो सकता। जो व्यक्ति लोभ में जीता है, उसे वीतरागता की पहचान नहीं हो सकती। भौतिक कचरे के साथ-साथ मन में भरे कचरे को निकालें।
जिसके पास धन है उसका जीवन धन्य नहीं, अपितु जिसके पास धर्म है, उसका जीवन धन्य होता है। यह लोभ समता भाव का शत्रु है। अधैर्य का मित्र है, मोह के विश्राम करने की भूमि है, पापों की खान है, आपत्तियों का स्थान है, खोटे ध्यान का क्रीड़ावन है, कलुषता का भंडार है, शोक का कारण है, कलेश का क्रीड़ाग्रह है। अतः लोभ को छोड़ें – जिसने भी अनंतसुख प्राप्त किया है, लोभ छोड़कर ही किया है। बहुत भटक चुके हैं हम कषायों की अंधेरी घाटियों में। आओ चलें शौच धर्म के प्रकाश की ओर ताकि हम शाश्वत सिद्धत्व के आनंद में गोते लगा सकें।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि शरीर तो स्वभाव से ही अपवित्र है, उसमें पवित्रता यदि आती है तो रत्नत्रय से आती है। रत्नत्रय ही पवित्र है। इसलिए रत्नत्रय रूपी गुणों के प्रति प्रीतिभाव रखना चाहिए। रत्नत्रय धारण करने वाले शरीर के प्रति विचिकित्सा नहीं करनी चाहिए। विचिकित्सा का अभाव होना ही “निर्विचिकित्सा अंग” है। जीवन में शुचिता इसी अंग के पालन करने से आती है। यदि कषायों का पूरी तरह विमोचन नहीं होता तो कम से कम उपशमन तो किया ही जा सकता है। अवश्य ही अशुचिता से अपने जीवन को ऊपर उठाना हंसी-खेल नहीं है, लेकिन खेल नहीं होते हुए भी उस ओर दृष्टिपात तो अवश्य करना चाहिए। वीतराग यथाजात दिगंबर रूप ही पवित्र है, क्योंकि इसी के माध्यम से आत्मा चार प्रकार की आराधना करके मुक्ति को प्राप्त होती है और अंततः पवित्र होती जाती है।
