वात्सलय वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज के जन्म दिवस पर विशेष
श्री शांति सिंधु सी निर्भयता
हो वीर सिंधु सी निर्मलता
श्री शिव सागर जी सा अनुशासन
हो धर्म सिंधु सी निस्पहता
संयत वाणी चिंतन शक्ति
हो अजित सुरिवर सी दृढ़ता
इन गुणों का संचय हो
वर्द्धित हो मन की मृदुता
हो मार्ग आपका निष्कंटक
यशवती बने यह परम्परा
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के *72 वे जन्मदिन अवतरण वर्ष दिवस भादव सुदी 7 सप्तमी दिनांक 18 सितम्बर 1950 पर जीवन परिचय
आओ शांति मार्ग पर चले…
20 वी सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री 108 शांति सागर जी महाराज* की अक्षुण्ण पट्ट परम्परा में तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी से दीक्षित मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के *पंचम पट्टाधीश राष्ट्र गौरव वात्सल्य वारिधि तपोनिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज भरत चक्रवती के नाम पर अवतरित भारत देश मे राज्य मध्यप्रदेश में कई भव्य आत्माओं ने अवतरित होकर श्रमण मार्ग अपनाया है ।इसी राज्य के खरगौन जिले के सनावद नगर जो कि सिद्ध क्षेत्र श्री सिद्धवरकूट, श्री सिद्धक्षेत्र पावागिरी ऊन, श्री सिद्ध क्षेत्र चूलगिरी बावनगजा बड़वानी के निकट है।
इन सिद्ध क्षेत्रों से करोड़ो मुनि मोक्ष गए है।
प्रातः स्मरणीय प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती परमपूज्य 108 आचार्य श्री शांतिसागर जी गुरुदेव की अक्षुण्ण पट्ट परम्परा में तृतीय पट्टा धीश आचार्य श्री धर्म सागर जी से दीक्षित जिनधर्म प्रभावक राष्ट्र गौरव पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज सहित 16 साधुओं एवम अनेक प्रतिमा धारी भैया दीदी की गौरवशाली जन्म भूमि, कर्मभूमि,समाधिभूमि
ऐसी पवित्र धर्म नगरी सनावद में पर्युषण पर्व के तृतीय उत्तम आर्जव दिवस पर एक प्रतिभाशाली कुल परिवार नगर का मान बढ़ाने वाले यशस्वी बालक यशवंत का जन्म माता श्रीमती मनोरमा देवी जैन की उज्जवल कोख से प्रसवित हुआ। आपके पिता श्री कमलचंद जी जैन उपजाति पोरवाड़ से है । 18 सितम्बर 1950 *भाद्रपद शुक्ल सप्तमी संवत 2006* को अवतरित होनहार भाग्यशाली सौभाग्यशाली पुत्र के पूर्व 8 पुत्र 4 पुत्रियां असमय काल का ग्रास हुई ।

आपके माता पिता ने रिश्तेदारों की सलाह अनुसार आप माता की कोख में थे,तब माता पिता ने महावीर जी में मंदिर की 108 परिक्रमा लगाकर मंदिर की दीवाल पर उल्टे स्वस्तिक बनाकर यह मन्नत ली कि हम बालक का मुंडन यही कराएंगे। मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई।
13 का अशुभ अंक शुभ बना ,बालक श्री यशवंत के रूप में 13 वी संतान का जन्म हुआ।
पावन पर्युषण पर्व के आर्जव धर्म दिवस जन्म होना जैसे जन्म कल्याणक हुआ हो।उस समय बालों का मुंडन नही हुआ।तो संयोग ऐसा बना कि आपकी मुनि दीक्षा श्री महावीर जी मे हुई और आपके दीक्षा पर केशलोचन हुए। जब बालक श्री यशवंत 1 वर्ष के हुए तो 5 वर्ष की उम्र तक आपको ननिहाल बगैर माता पिता के रखा गया। जब आपकी उम्र मात्र 12 वर्ष की थी तब आपकी माता जी का असामायिक निधन हुआ ।
आपने सन 1964 में श्री बावनगजा बड़वानी में आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज और आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी महाराज के दर्शन किये ।सन 1964 में तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज के सनावद में मुनि अवस्था के दर्शन किये ।
सन 1965 में आर्यिका 105 श्री इंदुमती माताजी का सनावद चातुर्मास हुआ ।सन 1967 में आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी का सनावद चातुर्मास हुआ ।
व्रत नियम
सन 1967 में श्री मुक्तागिर सिद्ध क्षेत्र में आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी से *आजीवन शूद्र जल* त्याग और 5 वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत* लिया ।
जनवरी 1968 बागीदौरा राजस्थान में आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज से *आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया ।ग्राम करावली में सर्व प्रथम आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज के दर्शन किये । सनावद वासियो के साथ श्री गिरनार जी एवम बुंदेलखंड की तीर्थ यात्रा कर। बालक यशवंत वापस सनावद आ गए ।सन 1968 को श्री यशवंत पुनः ग्राम पालोदा में आचार्य श्री शिव सागर जी के दर्शन हेतु गए।
गृह त्याग
मई 1968 से आप संध में शामिल हो गए । भीमपुर जिला डूंगरपुर में आपने द्वितीय पट्टाधीशआचार्य श्री शिव सागर जी महाराज से *गृह त्याग* का नियम लिया ।
दीक्षा हेतु श्रीफल भेंट
बाल ब्रह्मचारी श्री यशवंत जी ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में फागुन कृष्णा चतुर्दशी संवत 2025 सन 1969 को *श्री महावीर जी* मे *आचार्य श्री शिव सागर जी महाराज* को मुनि दीक्षा हेतु श्रीफल चढ़ा कर निवेदन किया । गुरुदेव के आदेश से अगले दिन श्री सम्मेदशिखर जी की यात्रा पर गए। आचार्य श्री शिव सागर जी महाराज की अनायास *समाधि फागुन कृष्णा 30 संवत 2025* को श्री महावीर जी मे होने के कारण पुनः नूतन आचार्य तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज को दीक्षा हेतु श्रीफल भेंट किया ।
मुनि दीक्षा
तृतीय पट्टाधीश नूतन आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज ने श्री महावीरजी मे फागुन शुक्ला 8 संवत 2025 24 फरवरी 1969 को 6 मुनि, 3 आर्यिका तथा 2 क्षुल्लक कुल 11 दीक्षाएं आपके सहित दी । अब ब्रह्मचारी श्री यशवन्त मुनि दीक्षा धारण कर *मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज* बन गए ।
*उपसर्ग*
*नेत्र ज्योति जाना*
श्री महावीर जी से आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज का विहार जयपुर खानिया जी हुआ ज्येष्ठ शुक्ला 5 पंचमी संवत 2025 सन 1969 को अनायास नव दीक्षित मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्रों की रोशनी चली जाती है उस समय उम्र मात्र 19 वर्ष की उसी समय डॉक्टर बुलाये गए अगले दिन डॉक्टरों ने नेत्रों का परीक्षण किया। डॉक्टरों ने परामर्श दिया कि बिना इंजेक्शन लगाए नेत्र ज्योति आना नामुमकिन है । संघ में विचार विमर्श होने लगा कि मात्र 19 वर्ष की उम्र में इतना उपसर्ग क्या किया जावे दीक्षा छेद कर डॉक्टरी इलाज कराने की भी चर्चा चली ।
मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज के कानों में चर्चा पहुँचने पर उनहोंने कहा कि में इंजेक्शन नही लगवायेगे प्रसंग आने पर
*समाधि ले लेंगे*
मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने 1008 श्री चंद्र प्रभु की वेदी पर मस्तक रख कर पूज्य पाद रचित *श्री शांति भक्ति का पाठ स्तुति* प्रारम्भ की । लगातार *2 दिन* अर्थात *52 घण्टे बाद* प्रभु भक्ति के प्रभाव से बिना डॉक्टरी इलाज क *नेत्र ज्योति वापस* आ जाती है ।उस घटना के समय आचार्य श्री धर्म सागर जी सहित 17 मुनि 25 आर्यिकाये 4 क्षुल्लक एवम 1 क्षुल्लिका सहित 47 साधु विराजित थे।

परमपूज्य आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी आकाश गमनी विद्या से आकाश में गमन कर रहे थे सूर्य की प्रचंड तेज रोशनी से आचार्य श्री की नेत्र ज्योति जाने पर श्री पूज्य पाद स्वामी ने श्री शांति भक्ति की रचना कर नेत्र ज्योति वापस पाई थी ।
उसी पवित्र शांति भक्ति के पाठ से परम पूज्य मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्र ज्योति
वापस आई । इन पवित्र नेत्रों से जब गुरुदेव का वात्सल्यमयी आशीर्वाद मिलता है तो भक्तों का मानव जीवन सफल हो जाता है।
*आचार्य पद*
*चारित्र चक्रवती प्रथमचार्य श्री 108 शांति सागर जी महाराज* की अक्षुण्ण पट्टपरम्परा के *चतुर्थ पट्टाचार्य श्री 108 अजित सागर जी महाराज* के *पत्र के माध्यम से लिखित आदेश अनुसार पारसोला राजस्थान में 24 जून 1990 आषाढ़ सुदी दूज* को *आचार्य पद* गुरु आदेश अनुसार दिया गया।
आचार्य पद के बाद वर्ष 1990 से वर्ष 2022 तक विभिन्न तीर्थ क्षेत्रो अतिशय क्षेत्रो प्रदेश राजधानियों महानगरों सिद्ध क्षेत्रो निर्वाण भूमियों आदि में किये वर्ष 2022 का चातुर्मास श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र में हो रहा है है।
*दीक्षाएं*
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी गुरुदेव ने अभी तक 93 दीक्षाये दी है । मुनि दीक्षा 33,आर्यिका दीक्षा 34,ऐलक दीक्षा 01,क्षुल्लक दीक्षा13,क्षुलिका दीक्षा12,प्रदान की
चातुर्मास
परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्द्धमान सागरजी महाराज ने 12 राज्यों जिसमे राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा,
उत्तरप्रदेश, गुजरात,कर्नाटक, तमिलनाडु, झारखंड, बिहार,बंगाल एवम मध्यप्रदेश में 54 चातुर्मास किये है।
यदि सिद्धक्षेत्रो के वर्षायोग का वर्णन करे तो आपने श्री तारंगाजी,श्री सम्मेद शिखर जी 2,श्री चंम्पापुरजी1,श्री कुंडलपुर1,श्री सिद्धवरकूट 1 हुआ
अतिशय क्षेत्र पर हुए चातुर्मास का विवरण श्री पदमपुरा1, लूणवा नागौर 1, श्री आणिदा पार्श्वनाथ 1,श्री श्रवणबेलगोला 6,श्री कुम्भोज बाहुबली1,श्री पपौरा जी1,श्री महावीरजी तपोभूमि1,आचार्य
श्री कुंद कुंद स्वामी की तपोभूमि पोन्नूर मले 1 हुआ।
महानगर चातुर्मास विवरण दिल्ली,कोलकाता,पुज्य गुरुदेव के
अधिकांश चातुर्मास स्थली किसी आचार्यो की मुनियों की जन्मभूमि तपस्थली पर हुआ वर्तमान में श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र में 54 वा चातुर्मास कर रहे है।
पंच कल्याणक प्रतिष्ठा
आपने आचार्य पद के बाद 54 वर्ष के साधु जीवन मे 60 से अधिक पंच कल्याणक देश के अनेक राज्यो सिद्ध अतिशय क्षेत्रों महानगर आदि में कराई है। मितव्ययता की दृष्टि से अनेक लधु पंच कल्याणक भी कराए है।
सल्लेखना
54 वर्ष के साधु जीवन मे आपने अनेक उत्कृष्ट सल्लेखना कराई है
शास्त्रों में उल्लेख है कि उत्कृष्ट समाधि होने पर भव्य जीव अगले 2 से 8 भव में मोक्ष जाता है।
विशेष
राष्ट्र में आप ऐसे संत आचार्य है जिनके नाम पर कोई प्रोजेक्ट नही है कोई मंदिर क्षेत्र मठ आपके नाम पर नही है। आपका सूत्र है हम हमारी छोडेगें नही दूसरे की बिगाड़ेंगे नही

उपाधिया
पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी को समाज द्वारा दी गई उपाधियां भी आपके महान व्यक्तित्व के आगे छोटी लगती है ।
वात्सल्य वारिधि ,आध्यात्मिक संत शिरोमणि, राष्ट्र गौरव, जिनधर्म प्रभावक, तपोनिधि, परंपरा के परम्पराचार्य, संस्कृति संरक्षक आदि अनेक उपाधि है।
3 बार महामस्तकाभिषेक
प्रथमाचार्य चरित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश होने के कारण 1008 श्री गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के 12 वर्षीय महामस्तकाभिषेक के लिए प्रमुख सानिध्य एवम मार्गदर्शन हेतु वर्ष 1993, वर्ष 2006 तथा वर्ष 2018 में आपको आमंत्रित किया गया। वर्ष 2018 में 390 से अधिक साधुओं ने लाभ लिया इसमें 35 से अधिक आचार्य भी शामिल हुए।
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
