अहंकार आठ फण वाला विषधर है- आर्यिका विज्ञाश्री

JAIN SANT NEWS निवाई

अहंकार आठ फण वाला विषधर है- आर्यिका विज्ञाश्री

निवाई

सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में बडा़ जैन मंदिर सहित बिचला जैन मंदिर शांतिनाथ जैन मंदिर चंद्र प्रभु जैन मंदिर में पर्युषण पर्व के चलते दसलक्षण धर्म महापर्व में गुरुवार को उत्तम मार्दव धर्म की विशेष पूजा अर्चना की गई

जिसमें श्रद्धालु उमड़ पड़े। जैन समाज के मीडिया प्रभारी विमल जौंला व राकेश संधी ने बताया कि गुरुवार को सभी जैन मंदिरों में एंव शांतिनाथ जैन मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ उत्तम मार्दव धर्म की पूजा अर्चना की गई जिसमें सैकडों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस दौरान गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माता जी ने मार्दव धर्म के दिन कहा कि भावों की मृदुता का नाम मार्दव है। मान कषाय का मर्दन करना ही मार्दव है। नरक का मार्ग मान है। अहंकार पतन का द्वार है, नम्रता उत्थान का द्वार है। मान इंसान को झुकने नहीं देता बल्कि दुनिया को झुकाना चाहता है। झुके बिना परमात्मा को पाना असंभव है। समर्पण का प्रथम पाठ है समर्पण। उन्होंने कहा- जब रावण, कंस आदि का मान खण्डित हो गया तो हमारा तो होना ही है। मान में भान नहीं होता इंसान अहंकार में फूल जाता है और अपने स्वरूप को भूल जाता है। माता जी ने कहा कि आज का दिन मैं को हटाने का है। क्योंकि मैं का नगाड़ा प्रेम की आवाज को मिटाने में सहायक है। मैं ही महाभयानक राक्षस है। आज के जमाने में बच्चे – बच्चे में अहंकार है अहंकार एक मीठा बदमाश है। अहंकार आठ फण वाला विषधर है। अहंकार व्यक्तित्व की संपूर्णता को नष्ट कर देता है। अहंकारी सदैव निन्दा का पात्र होता है। अहंकार पाप का दाता है, दुख है, संताप है रोग है, महामारी है, ठगी है। और मृदुता पुण्य है, सुख है, आराम है, तपस्या है, स्वास्थ्य है। जो व्यक्ति झुकते हैं वे दुआओं से व संपदाओं
से भर जाते हैं। लघुता से प्रभुता मिलती है मिलती है। अहंकार एक ऐसा शत्रु है जो पकड़ में नहीं आता। अहंकारी व्यक्ति प्रतिपल अपनी प्रशंसा चाहता है। अहंकारी का नशा तो वैसा ही होता है जैसा-घंटाघर पर बैठा बन्दर घंटाघर की ऊँचाई को अपनी ऊँचाई मानता है। आदमी अकड़ता है और भूल जाता है कि एक मौत का भी दिन है। अहंकार परमात्मा के

विरोध की दिशा है अहंकार पैर की जूती है। उसे सिर पर ढोना नादानी है, अहंकार की कार से मंजिल नहीं मिलती। मान कषाय से मानव के ज्ञान रूपी नेत्र बन्दु हो जाते हैं। मान आचार-विचार रुपी बादलों को नष्ट करने के लिये वायु के समान है। विनय रूपी जीवन को नष्ट करने के लिये विषधर सर्प है। कीर्ति रूपी कमलिनी को उखाड़ने के लिये गजराज है। धर्म अर्थ और काम रूपी त्रिवर्ग का नाश करने वाले मान को मार्दव धर्म को ग्रहण करना चाहिये। विमल जौंला व प्रतीक जैन ने बताया कि आर्यिका विज्ञा श्री माताजी के सानिध्य में सांयकाल धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें अन्ताक्षरी प्रतियोगिता आयोजित हुई जिसके मुख्य अतिथि टोंक जिला प्रमुख सरोज बंसल एवं नरेश बंसल रहे। कार्यक्रम के तहत 8 सितंबर को महिलाओं द्वारा नाटक का मंचन किया जाएगा जिसमें देश भर से श्रद्धालुगण शामिल होंगे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *