इंदौर। क्रोध के अभाव का नाम क्षमा है। क्रोध पागलपन और एक ऐसा जहर है, जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और पश्चाताप से समाप्त होती है। क्रोधित व्यक्ति दूसरों के साथ स्वयं का भी विनाश करता है। क्रोध करने से संकलेषता बढ़ती है, बुद्धि और विवेक क्षीण होता है एवं क्रोध के कारण यश कीर्ति भी नष्ट होती है। यह उद्गार मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने पर्युषण पर्व के प्रथम दिन समोशरण मंदिर कंचन बाग में उत्तम क्षमा धर्म पर प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि क्रोध से मिलती है पीरा (पीड़ा), क्षमा धारो वीरा। व्यक्ति के मान को ठेस लगने, अपेक्षा पूरी ना होने और मानसिक अस्त व्यस्तता होने के कारण व्यक्ति को क्रोध आता है। क्रोधी और अहंकारी व्यक्ति के पास बोधि और क्षमा का नीर नहीं होता। क्षमा धर्म की नींव है आत्मा में क्षमा भाव आने पर ही 10 धर्म उद्घाटित होंगे। मुनि श्री सहज सागर जी महाराज ने भी क्षमा के महत्व पर प्रकाश डाला।
प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने बताया कि बुधवार से 10 दिवसीयश्रुत साधना संस्कार शिविर का शुभारंभ हुआ। शिविर में 200 शिविरार्थी मुनि संघ के सानिध्य में श्रुत की साधना और धर्म की आराधना के माध्यम से आत्म कल्याण करेंगे।
