रेवाड़ी । परम पूज्य आचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने दसलक्षण महापर्व के अवसर पर अतिशय क्षेत्र नसिया जी में आयोजित श्री तीस चौबीसी महामण्डल विधान में धर्म के प्रथम लक्षण “उत्तम क्षमा” की व्याख्या करते हुए कहा कि क्षमा आत्मा का स्वभाव है| इसके विभाव रूप परिणमन से ही जीव क्रोधी हो जाता है और विनाश की ओर चला जाता है| जो व्यक्ति क्रोध के उत्त्पन्न होने के साक्षात् बाहरी कारण मिलने पर भी थोड़ा भी क्रोध नहीं करता, उसे क्षमा धर्म होता है| हमें उत्तम क्षमा को अपनाकर क्रोध ना करने का संकल्प लेना चाहिए और प्रेम से जीवन व्यतीत करना चाहिए|
क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध (गुस्सा) के अभाव रूप शांति-स्वरुप पर्याय प्रकट होती है उसे भी क्षमा कहतें हैं| आत्मा वैसे तो क्षमा स्वभावी है पर अनादी से आत्मा में क्षमा के अभावरूप क्रोध पर्याय ही प्रकटरूप से विद्यमान है| आचार्य श्री ने आगे कहा कि जिस प्रकार सरोवर में कंकड़ फेंकने के उपरांत उसमें अपना चेहरा नज़र नहीं आता और उसमें भीतर पड़ी वस्तु भी दिखाई नहीं देती| जिस प्रकार सरोवर में कीचड़ हो फिर भी अपना चेहरा नज़र नहीं आता और उसमें भीतर पड़ी वस्तु दिखाई नहीं देती| ठीक उसी प्रकार हमारी आत्मा का सरोवर जब तक शांत व मलिनता रहित नहीं होगा तब तक हमें अपना उज्जवल स्वरुप दिखाई नहीं देगा|
एक बार यदि यह क्षमा अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाये और आत्मा से क्रोधादि कषाय समाप्त हो जाये तो लोक में होने वाला कोई भी विप्लव उसे अपने स्वभाव से च्युत नहीं कर सकता अथवा नीचे नहीं गिरा सकता व प्रभावित नहीं कर सकता| जैसे-जैसे क्षमा का प्रकाश हमारे भीतर प्रकट होता जायेगा, वैसे-वैसे ही क्रोध रुपी अंधकार स्वयं हमारे भीतर से लुप्त होता जायेगा| क्षमा वह नौका है जिसपर बैठकर व्यक्ति क्रोध के अथाह सागर को पार कर सकता है| क्रोध स्वयं अधोगामी है तथा इसकी संगति करने वाला भी अधोगति को प्राप्त होता है| क्रोध का प्रारम्भ मूर्खता से होता है एवं अंत पश्चाताप से होता है|
