पारसनाथ
पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अपने उदबोधन में मन मे बोध जगाकर विवेक जाग्रत करने की सीख दी। ग़ुस्से पर नियंत्रण रखने की सीख दी।
एक उदाहरण से बताया की जब आप अधिकारी से बात करने जाते है और अधिकारी गुस्सा होता है,तब आप क्या करते है क्या आप प्रतिवाद करते है, नही मैं किससे बात कर रहा हु अगर मैं क्रोध करूंगा तो मेरा काम बिगड़ जाएगा यह विवेक आप मे जाग्रत हो गया। यदि आप परिवार में भी गुस्सा करेगे तो परिवार में भी सम्बन्ध बिगड़ जाएगे। अपने अंदर विवेक जाग्रत करे।
अपने अंदर बोध जगाए।बोध में बड़ी ताकत होती है। हमें स्वरूप का बोध होना चाहिए। यदि क्रोध के समय मे तुम्हे बोध हो जाए तो क्रोध तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ेगा। यदि अंतरंग में ऐसी भूमिका का बोध होगा तो सब शांत होगा। बोध को बनाए रखने के लिए सकारात्मक सोच रखे।यदि सकारात्मक सोच होगी तो हमारी प्रतिक्रया बदल सकती है।उन्होंने कहा आप नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण आप अपने से दूर हो जाते है। अपनी मानसिकता ऐसी बनी बनाए क्रोध न हो। यह सदगुण विकसित कर अपने जीवन को बेहतर बनाए।
उन्होंने समग्रता के चिंतन के विषय पर कहा कि पहले किसी की बात सुनो, समझो,फिर प्रतिक्रिया दो।तब मधुरता होगी। यदि मन को मोड़ने की कला आप मे आ गई तो आनंद की झड़ी लग जाएगी। यदि जीवन मे बदलाव लाना है, तो इसे धरातल पर लाना आवश्यक है। 10 दिन तक समग्रता का चिन्तन करो।
प्रवचन उपरान्त पूजन किया गया सभी मोजूद भक्त भक्ति से ओतप्रोत रहे।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
