भारत ऐसा देश हैं जिसका नाम शांति के लिये विश्व मे सर्वोच्च स्थान हैं दुनिया मे दण्डात्मक शांति हैं लेकिन भारत मे अध्यात्म हैं सुधासागर महाराज
ललितपुर
रविवार को नित्य प्रति प्रवचन की श्रंखला मे पूज्य गुरुदेव ने कहा कि आदमी दो तरह के दुखों से दुखी हैं एक उसका स्वयं का दुख और एक दुसरो के द्वारा दिया गया दुख। मुनि श्री ने कहा, हमें जन्म लेने का अधिकार तो हैं मगर मरने का अधिकार हमारे पास नही हैं,, हजारों साल से लोग इस बात के कानून की राह देख रहे हैं कि उन्हें इच्छा म्रृत्यु का वरदान मिल जाये। लेकिन ऐसा कानून न तो बना है, और न ही बन सकता हैं। क्योंकि मरना तो अलग बात है, मरने का भाव भी करना महापाप बताया गया हैं। धर्मशास्त्र कहते हैं कि जीव को मारने की अलग अलग व्यख्या हैं, जैसे आदमी चींटी को मारे , सामान्य व्यक्ति को मारे और तीसरा एक बड़े सेलेब्रिटीज़ को मारता हैं तो सजा अलग अलग हैं। ऐसा इसलिये हैं कि मरने वाले से फर्क कितने लोगों को पड़ा दुखी कितने लोग हुए।
पूज्य गुरुदेव ने कहा की ऐसा पाप कभी नही करना जिसमे स्वयं को रोना पड़े, दुखी होना पड़े, किसी से नजरें चुराना पड़े, राजा और महाराज में यही अंतर हैं राजा दण्ड देता हैं और अपराध होने से रोकता हैं। जबकि महाराज उससे होने वाले नुकसान को बताते हैं पाप से बचाते हैं ,, पूरा विश्व राजा के कानून से चलता है। मगर भारत एक ऐसा अकेला देश हैं जिसमे महाराज भी दूसरा हिस्सेदार हैं। पहले मन्दिरो में न्यायालय हुआ करते थे, महाराज वहा न्याय करते थे, आज भी पनागर जैन मंदिर में एक न्यायालय देखने मिल जाएगा। भट्टारक वहां बैठ कर न्याय करते थे,,, पहले सांकेतिक न्याय हुआ करते थे, हा मा धिक जैसे तीन शब्दो से ही लोगो को दण्ड मिल जाता था। लेकिन आज न्यायालय में जाने के बाद मिले हुए न्याय को भी लोग नही मानते।
पूज्य गुरुदेव ने सीख देते हुए कहा की घर का कलेश, घर की कलह, घर की अशांति, कभी घर के बाहर न जाये तो सिद्धि देखने लायक होती हैं। पहले यह होता था, कि परिवार का न्याय मन्दिर में होता था। आज मन्दिरो की लड़ाई न्यायालय तक पहुच गई यही दुर्भाग्य पूर्ण है,, घर का मुखिया यदि अपनी बात को बाहर न कहने में सफल हो गया और शासन अनवरत चलता रहा तो, यकीन मानिए वह एक दिन देश और राष्ट्र का नेता बनने का बीज बो रहा है।
उन्होंने कहा कि परिवार की कलह न्यायालय न जावे,बल्कि गुरू के चरणों मे जाकर निपटा लीजिये।
प्रकरणों के विषय में जिक्र किया
पूज्य मुनि श्री ने कहा की राजस्थान में ऐसे कई प्रकरण हुए हैं, जिनमे अदालत मेरे सामने हुई।
और जो न्याय मैने दिया उसे न्यायपालिका ने माना और हूबहू शब्दसः फैसला लिखा जो मैने कहा ,,,,
यहां भाव यह हैं कि जो जिस बात को भली भांति समझते हैं न्याय उन्ही से कराना,,
भारत देश के विषय में गुरुदेव ने कहा की भारत ऐसा देश हैं); जिसका नाम शांति के लिये विश्व मे सर्वोच्च स्थान है। दुनिया मे दण्डात्मक शांति हैं, लेकिन भारत मे अध्यात्म हैं, मन्दिर हैं, जो शांति को जन्म देते हैं, अपराधी अपराध करने के बाद मंदिर में जाकर आत्मग्लानि करते हैं, सजा मानते हैं, जबकि अन्यत्र तो झूठ बोलते ही रहते हैं।
जैन दर्शन में पाप बुरा नही हैं,बस चिंता इस बात की हैं उसे करने के बाद तुम्हारा नाम खराब न हो, जिंदगी बर्बाद न हो, धर्म बदनाम न हो।जैसे आप शराब पी रहें हैं, सिगरेट पी रहें हैं, गुटका खा रहे हैं तो खाओ, लाखों लोग खा रहे हैं, किन्तु यह देखना होगा कि आपके धर्म मे क्या लिखा है कि गुटका नही खाना हैं, यदि गुटके का निषेध हैं, और तुम खा रहे हो, धर्म मिटा रहे हो। तो बस यही पाप हैं। जबकि लाखो और लोगों ने खाया उन्हें पाप नही हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का उपदेश दिया ही नही गया।
गुरुदेव ने कहा हैं कि हमें ऐसा कुछ नही करना है, कि हमें अपनों से नजरें छिपाना पड़े। पुलिस का डर बना रहे गुरु के सामने न जा पाए ,, इतना नियम यदि हम अपनी जिंदगी में पाल लेंगे तो यकीनन अगले जन्म में राष्ट्रपति बनने का पुण्य लेकर जन्म लेंगें।
श्रीश जैन ललितपुर की कलम से
श्री श्रीश जैन अपनी कलम से बताते है की प्रवचनों से हमने तो यह सीख लिया कि हम कोई गलत काम अपनी जिंदगी में कभी नही करेंगे। जिससे अपनो से पुलिस से या गुरु से नजरें चुराना पड़े
,, उम्मीद करता हूं गुरुदेव के प्रवचनों से आप भी कुछ न हासिल करेंगे और पहले कुछ भी जीवन रहा हो, आपका लेकिन आगे कभी भी ऐसा कार्य नही करेंगे जिससे गुरु के चरण न छू सकें,,
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
