आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि ने रक्षाबंधन के पावन दिन 1105 दिन पश्चात अनाज का आहार लिया था।
श्री शांति वीर शिव धर्म अजीत वर्धमान सुर्रिभ्यो नमः
बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरु नाम गुरु प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनिराज ने रक्षाबंधन के पावन दिन 1105 दिन पश्चात अनाज का आहार लिया था। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महारा ने दिगम्बर मंदिर में विधर्मियो के प्रवेश के विरोध में जैन समाज मे जागरूकता एवम जैन धर्म के अस्तित्व संस्कारो आगम की रक्षा के लिए 1105 दिन तक आहार में अनाज का त्याग किया था।
भारत के सर्वोच्य न्यायालय के आदेश कि जैन धर्म का अस्तित्व एवम हिन्दू धर्म का अस्तित्व पूजा पद्धति मान्यता अलग अलग है। इस निर्णय के बाद रक्षाबंधन के दिन आहार में अनाज ग्रहण किया। शास्त्रीय प्रमाण है कि 700 मुनिराजों का उपसर्ग श्री विष्णु मुनिराज के कारण प्रयासों से रक्षाबंधन के दिन दूर हुआ था।
इस कारण रक्षाबंधन के दिन विष्णु मुनिराज सहित 700 साधुओं की विशेष पूजन की जाती है
चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का परिचय
भोज ग्राम के श्रीमती सत्यवती जी श्री भीमगोड़ा जी पाटिल के यहां सन
1872 में 1008 श्री वासुपूज्य भगवान के गर्भ कल्याणक दिवस आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत 1929 एक महामना का जन्म हुआ जिनका नाम सातगोंडा जी रखा गया आपसे बड़े 2 भाई तथा एक भाई छोटा तथा एक बहन भी थी। आपमें बचपन से ही धार्मिक संस्कार रहे 18 वर्ष की उम्र में अपने बिस्तर का त्याग कर दिया
आजीवन ब्रहचर्य व्रत
आपने 18 वर्ष की अल्पायु में श्री सिद्ध सागर जी से आजीवन ब्रहचर्य व्रत लिया व 25 वर्ष की उम्र में जूते चप्पल का त्याग कर दिया। 32 वर्ष की उम्र में अपने सम्मेद शिखर जी की यात्रा की घी और तेल का आजीवन त्याग कर दिया। सम्मेदशिखर जी
तीर्थ की यात्रा के बाद 32 वर्ष की उम्र में ही एक समय भोजन का नियम ले लिया जीवन आपने एक समय ही भोजन किया ।
एक आत्मा जो पुण्यात्मा बन कर धर्मात्मा बन कर परमात्मा बनने की राह पर है उनका गुणानुवाद

सन् 1915 में आपने उत्तर ग्राम में क्षुल्लक दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी स्वामी से ली व ऐलक दीक्षा आपने गिरनार यात्रा सन 1918 में 1008 श्री नेमिनाथ भगवान की 5 वी टोंक पर स्वयम ने ऐलक दीक्षा ली। सन 1920 यरनाल कर्नाटक में आपने मुनि दीक्षा ग्रहण की। आपको सन 1924 में आचार्य पद दिया गया। सन 1925 में श्री श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक के बाद गुरुणा गुरु की उपाधि दी गई।

आपने दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी को पुनः मुनि दीक्षा दी इसलिए भी गुरुणा गुरु कहा जाता है। सन 1937 में आपको चारित्र चक्रवर्ती पद दिया गया।
जिनवाणी संरक्षण
आपकी प्रेरणा से धवल जय धवल टीका वाले षटखंडागम महाबंध कषाय पाहुड ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे पर 2664 पत्रों पर अंकित कराया यह ग्रंथ आज भी फलटण में सुशोभित विराजित है
उपसर्ग
आपके जीवन मे सर्प के कोंगनोली गोकाक कौंनुर शेडवाल आदि 5 से अधिक अनेक उपसर्ग सिंह के गोकाक, मुक्तागिर जंगल
श्रवणबेलगोला यात्रा सोनागिर बावनगजा, द्रोणगिरी सिद्ध क्षेत्रो 6 से अधिक उपसर्ग से अधिक मकोड़े के चींटी के मानव जन्य उपसर्ग हुए है। आपने नाम अनुरूप शांति के सागर बन कर उपसर्ग सहन किये
आपने अपने जीवन के साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए
आपने 26 मुनि दीक्षा दी जिंसमे प्रथम मुनि शिष्य श्री 108 वीरसागरजी हुए व 4 आर्यिका दीक्षाए दी जिसमें प्रथम आर्यिका 105 श्री चन्द्रमती माताजी हुई। आपने 16 ऐलक दीक्षा व 28 क्षुल्लक दीक्षा दी आपके द्वारा प्रथम
ऐलक श्री पारीस सागर जी हुए व प्रथम क्षुल्लक 105 श्री नेमकीर्ति जी हुए व 14 क्षुल्लिका दीक्षा प्रथम क्षुल्लिका 105 श्री शांतिमति माताजी हुईं। आपने कुल 88 दीक्षाएं दी।
आपके बड़े भाई ने भी आपसे मुनि दीक्षा लेकर मुनि श्री108 वर्द्धमान सागर जी महाराज बने
आपने 9938 उपवास किए हैं ।
1105 दिन तक अनाज का त्याग विधर्मियो के मंदिर प्रवेश के विरोध में किया।8 वर्षों तक आपने केवल दूध चावल पानी ही लिया। वही 8 दिन तक केवल आहार में पानी ही नही लिया। आपने ललितपुर चातुर्मास सन 1929 में सभी रसों का आजीवन त्याग किया।
24 अक्टूम्बर 1951 में गजपंथा जी मे 12 वर्ष की नियम सल्लेखना ली। 26 अगस्त 1955 को लिखित पत्र से मुनि श्री वीर सागर जी को आचार्य पद दिया। 36 दिन की सल्लेखना में 18 सितम्बर 1955 को आपकी उत्कृष्ट समाधि हुई।
वर्तमान में आपकी मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा में पंचम पट्टाधीश पद को वर्ष 1990 से वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी सुशोभित किया। वर्धमान साग़र महाराज वर्ष 2021 का चातुर्मास कोथली में करने के बाद अब गुरुदेव का श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में वर्ष 2022 का वर्षायोग स्थापित किया है। उल्लेखनीय है कि 24 वर्ष बाद आयोजित 1008 श्री महावीर स्वामी के महामस्तकाभिषेक के लिए श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में विराजित है
18 जुलाई 2022 को चातुर्मास कलश स्थापना ससंघ की है
सभी आचार्यो को कोटिशः नमोस्तु
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
