अध्यात्म का प्रवेश द्वार दीक्षा है ,आमूलचूल परिवर्तन का मार्ग दीक्षा है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

JAIN SANT NEWS श्री महावीर जी

अध्यात्म का प्रवेश द्वार दीक्षा है ,आमूलचूल परिवर्तन का मार्ग दीक्षा है।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

श्री महावीर जी

वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्द्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से दो भव्य धर्मात्मा जीवो की दीक्षा संपन्न हुई।

इस अवसर पर आचार्य श्री ने संबोधित कर बताया कि जीवन में प्रेरणा प्राप्त कर मनुष्य पर्याय की सार्थकता प्राप्त करना चाहिए। गुरु के सानिध्य से रत्नत्रय रूपी सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान ,सम्यक चारित्र की प्राप्ति होती है। अध्यात्म का प्रवेश द्वार दीक्षा है। जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का मार्ग ही दीक्षा है।

आचार्य श्री ने आगे बताया कि भोगों से विरक्ति होने पर दीक्षा प्राप्त कर आत्म साधना की जाती है। दीक्षा से तपस्वी का प्रथम चरण प्रारम्भ होता है जो सम्यक सल्लेखना समाधि तक चलता है।

गुरु चरणों के सानिध्य में समर्पण श्रद्धा के बिना आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता है।

शक्ति भक्ति से भगवान बन सकते हैं भगवान की भक्ति तथा व्रतों को धारण करना चाहिए।

उन्होंने कहा भगवान श्री पारसनाथ जी का मोक्ष कल्याणक दिवस है, जिस प्रकार लड्डू मिठाई देखकर हमारा मन प्रसन्न होता है, वही प्रसन्नता से हमें भगवान को भी लाडू मोदक चढ़ाना चाहिए।

मोदक आनंद देने वाला है उसी प्रकार प्रभु की भक्ति भी आनंद देती है।

आचार्य श्री ने आगे बताया कि एक कथानक के माध्यम से भगवान पार्श्वनाथ के पूर्व पर्याय के दोनों भाइयों का वर्णन बताया कि किस प्रकार हाथी वन में रहते हुए नियमो व्रत का पालन करते हुए देव गति को प्राप्त करते है ,उसी प्रकार श्री महावीर स्वामी की पूर्व पर्याय देखे तो पुरवा भील, सिंह पर्याय से जीव श्री महावीर स्वामी बने है। आज सर्वश्रेष्ठ मानव जाति अपने नियमो व्रतों को भंग कर दोष लगाते है। आप सब सौभाग्य शाली है आपको दीक्षा महोत्सव निर्वाण कल्याणक का मंगल मय अवसर मिला है।

आज सौभाग्य शाली महिलाओं ने दीक्षार्थियों के लिए चोक पुरन की कार्य किया है यह केवल चांवल और कपड़े बिछाने की क्रिया नही है, आपको सबको यह भावना करना चाहिए कि हमारे जीवन मे भी ऐसा मंगल अवसर आवे कि हमारी दीक्षा के लिए कोई चोक पुरने का कार्य करे हमारी दीक्षा भी जल्दी हो।

हमारी भी दीक्षा श्री महावीर जी मे हुई है।

आपको भी दीक्षा महोत्सव देखकर दीक्षा लेने व्रत प्रतिमा नियम की भावना करना चाहिए। इन दोनों भव्य जीवो ने संघ की बहुत सेवा समर्पण भाव से की है।

गुरुसेवा का फल दीक्षा रूप में मिला है।

दोनो भव्य जीवो की भावना यही है कि गुरु चरणों मे समाधि लेकर जीवन को सफल बनावे।

सभी को मंगल आशीर्वाद।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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