अध्ययन करते समय पूरी तरह एकाग्रता और विनय के भाव जरूरी हैं सभी विद्याओं के बावजूद कोई इच्छा नहीं रखने वाले गणधर होते हैं:माताजी

ग्वालियर
विद्या के तीन भेद होते हैं, जाति, कुल और तप। जाति विद्या मातृपक्ष से मिलती है, कुल विद्या पितृपक्ष से और तप विद्या उपवास, साधना आदि से प्राप्त होती है। समस्त विद्याओं के बाद भी जो किसी कार्य आदि की इच्छा नहीं करते, वह गणधर कहलाते हैं। यह विचार ब्रह्म विद्या वाचस्पति पट्ट गणिनी आर्यिकाश्री विज्ञमती माताजी ने रविवार को गणधर वलय स्तोत्र सेमिनार में चौथे काव्य की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए।
माताजी ने कहा कि हमें विनयपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। अध्ययन करते समय पूरी तरह एकाग्रता जरूरी होती है। कभी भी विनय का पथ नहीं छोड़ना चाहिए, अहंकार के रास्ते पर नहीं चलना चाहिए, गुरु का सानिध्य कभी नहीं छोड़ना चाहिए। तभी ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। माताजी ने बताया कि विद्या सुख के वातावरण में नहीं आती, दुःख में आती है। जब पढ़ोगे, तभी उच्च पद पर पहुंच पाओगे। इसके लिए गणधर देवों की स्तुति, वंदना करना और गुरुओं का सानिध्य बहुत जरुरी होता है।
जिनवाणी स्तुति की हुई गूंज


जैन समाज के प्रवक्ता ललित जैन ने बताया कि माँ जिनवाणी स्तुति
“जय जिनवाणी माता, रख लाज हमारी जय जिनवाणी माता”
के संगीतमय गायन में पूज्य माताजी के स्वर में हजारों श्रोताओं ने अपना स्वर मिलाया तो पूरा पांण्डाजिनवाणी स्तुति से गूंज उठा!
*सुबह साढ़े सात बजे खचाखच भर जाता है आयोजन स्थल-*
16 दिवसीय इस सेमिनार में भाग लेने वाले उत्साहित महिला पुरुष एवं युवाओं को टोली सुबह 7 बजे आयोजन स्थल पर पहुंच जाते है! साढ़े सात बजे तक तो पूरा पांडाल खचाखच भर जाता है!
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
