साेच बदलाे और देखाे, दुनिया बदल जाएगी
खुरई
पूज्य निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज ने अपने उद्बोधन दुसरो को बदलने से अच्छा है स्वयम को बदलने पर जोर दिया उन्होने कहाजीवन को अच्छा बनाने के लिए दुनिया के वे सभी सर्वश्रेष्ठ विचार भी व्यर्थ हैं की जब तक कि उन्हें क्रियान्वित न किया जाए। उन्होने स्वयं को समझने पर जोर देते कहा की हम स्वयं को जितना अच्छी तरह से समझ पाएगे उतना ही शांत व सुखी रहना सहज होगा । उन्होने इस बात पर भी जोर दिया की यदि हम अपने अंतर मन के विचारों को दबाने की बजाय इन्हें खुलकर व्यक्त करें, तो हमारा मन शुद्ध हो जाता है।। उन्हाेंने आगे कहा कि दूसरों को बदलने से अच्छा है कि हम अपने आप को बदल लें। अक्सर हम यह सोचते है कि दूसरा व्यक्ति अथवा हमारे आस-पास मौजूद लोग हमारे अनुरूप काम करें। हमारी बात को, हमारी भावनाओं को समझें। हम आजीवन इस प्रयास में लगे रहते हैं कि हम दूसरों को बदल देंगे, लेकिन इस उधेड़-बुन में ही सारा जीवन बीता जाता है, लेकिन जिनसे हम अपेक्षा करते हैं वह अपने स्वभाव मंे बदलाव नहीं लाते। मनुष्य को सोचना चाहिए जिसे पहले बदलने की जरूरत है, वह मैं हूं। जब हम इस बात पर विचार करेंगे कि खुद को बदलअपेक्षा करते हैं वह अपने स्वभाव मंे बदलाव नहीं लाते। मनुष्य को सोचना चाहिए जिसे पहले बदलने की जरूरत है, वह मैं हूं। जब हम इस बात पर विचार करेंगे कि खुद को बदलना कितना कठिन है, तब हम समझ जाएंगे कि दूसरों को बदलने की कोशिश करना कितना चुनौतीपूर्ण काम है। निर्यापक श्रमण मुनिश्री संभवसागर महाराज ने कहा कि एक पत्थर तोड़ रहा है, दूसरा पेट पाल रहा है और तीसरा मंदिर बना रहा है। बंधुओ, संसार में सब जीते है, जीने का तरीका और क्रिया ऊपरी तौर पर एक जैसी दिखाई देती है, पर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है। सोच बदलो और देखो सारी दुनिया बदल जाएगी। जो दुनिया को बदलने की नहीं, अपने को बदलने की चिंता करता है, वह जीवन के प्रति वफादार है। बदले हुए मनुष्य में दुनिया को बदलने का झूठा अहं नहीं होता, फिर भी दुनिया उससे बदलती है।उन्हाेंने कहा कि दुनिया में तीन मूर्खताएं उपहास्यास्पद होते हुए भी कितनी व्यापक हो गई हैं यह देखकर आश्चर्य होता है कि, पहला- लोग धन को ही शक्ति मानते हैं। दूसरी बात- कठोर परिश्रम से बचे रहकर भी आरोग्य की आकांक्षा की जाती है। तीसरी मुख्य बात यह है कि लोग अपने को सुधारे बिना दूसरों को सुधारने का उपदेश देते हैं। विपदा के समय अपने विचारों में संतुलन बनाए रखना एक कला है। हम दुनिया को नहीं बदल सकते, मगर दुनिया के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल सकते है। उन्हाेंने कहा कि औरों की मदद करो और स्वयं को रूपान्तरित करो, सकारात्मक सोच विकसित करो। इन तीन बातों को जीवन के तीन मील के पत्थर मानें। मन में बदलाव लाए बिना किसी भी काम में बदलाव नहीं लाया जा सकता। जो दूसरांे को बदलना चाहता है उसे स्वयं बदलना होगा। हर व्यक्ति की विशेषताओं को देखें और अपनी कमजोरी को दूर करें। अपनी गलतियों को देखने और सुधारने से ही व्यक्ति प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है। विचारों के अनुसार ही बनता है, व्यक्ति का व्यक्तित्व।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
