आचार्य विनितसागर ने किया केशलोंच वर्तमान समय मे सन्तो की साधना का कठिन पड़ाव है केशलोचन
कामा
दिगंबर जैन संतो की सबसे कठिन चर्या में यदि कोई चर्या आती है तो वह केश लोंच ही है। जीवों की रक्षार्थ,अहिंसा धर्म की पालनार्थ व स्वयं को कसौटी पर कसने हेतु जैन सन्तो द्वारा केश लोंच किया जाता है। जैन सन्तो को केशलोंच से आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है तो वही शरीर के प्रति उपेक्षा की भी प्रतिपुष्टि होती है। उक्त उदगार कामां के विजयमती त्यागी आश्रम में केशलोंचन उपरांत आचार्य विनीत सागर महाराज ने व्यक्त किये।आचार्य ने कहा कि केशलोंच साधु के 28 मूलगुणों में से एक मूल गुण है। चार माह में जद्यन्य,तीन माह में मध्यम व दो माह में उत्कृष्ट केशलोंच होता है। स्वयं के दाढ़ी, मूंछो व सिर के बालों को उखाड़ फेंकना वर्तमान भौतिकवादी युग मे दुर्लभ क्रिया है जो दिगम्बर सन्तो के द्वारा ही कि जाती है। जैन सन्तो व साध्वियों को दीक्षा के समय भी पंच मुष्ठी केश लोंच किया जाता है तभी दीक्षा सम्भव होती है। आचार्य ने कहा कि वर्तमान समय मे जैन सन्तों की साधना का कठिन पड़ाव है केशलोचन। आचार्य ने कहा कि संयम,साधना,तप,त्याग और परहित ही साधु के जीवन का मूल उद्देश्य होता है। साधु जहां स्वयं के कल्याणार्थ संयम की सीढ़ी चढ़ते हैं तो वे परहित हेतु भी मार्गप्रदर्शित करते हैं। वर्षायोग समिति के मीडिया प्रभारी संजय जैन बड़जात्या ने बताया कि गुरुवार को दोपहर कामां के विजयमती त्यागी आश्रम में आचार्य विनितसागर महाराज ने केशलोंच किया। वास्तविक रूप से स्वयं के दाढ़ी,मूछों व सिर के बालों को स्वयं द्वारा उखाड़ना केशलोंच की क्रिया कहलाता है। आचार्य श्री को केशलोंच करते देख उपस्थित श्रद्धालु भाव विभोर हो गए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
