अपशब्द बोलना मानसिक क्षमता को कम करता है कनकनन्दी आचार्य
भीलूड़ा
शांतिनाथ जिनालय भीलूड़ा में विराजित आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में बताया कि शरीर विज्ञान के अनुसार ही दो कान है और एक मुंह है, विधि ने भी दो कान और एक मुह दिया है।अतः अधिक सुनना चाहिए बोलना कम चाहिए। अधिक सुनो,कम बोलो, कर्म सिद्धांत और मनोविज्ञान के अनुसार भी यह सही है। उन्होनें कहा झूठ बोलने पर ब्रेन को अधिक स्ट्रगल करना पड़ता है। अपशब्द बोलना भी मानसिक क्षमता को कम करना है। ह्रदय श्रद्धा, भक्ति, सत्य का प्रतीक हैं। जैसे भाव होंगे, उसी प्रकार हमारी वचन तथा क्रियाएं होगी। उन्होंने कहा घातक अस्त्र विचार है। जैसे विचार करेंगे वैसे ही कार्य करेंगे। मन वचन काय कृत कारीत अनुमोदना से सत्य वचन बोलना चाहिए। निंदा, चुगली, अपमान के भाव होना भी हिंसा हैं। जहां छोटा खोटा कषायी से युक्त भाव है वह झूठ है। जिससे व्यक्ति का पतन हो वैसे खोटे शब्द कभी प्रयोग नहीं करना चाहिए। धर्म के नाम पर अधर्म अधिक होता है। उदार पुरुष कि वसुधैव कुटुंबकम की भावना रहती है। सत्य कोई मनोविज्ञान व आधुनिक विज्ञान नहीं है परमेश्वर है। व्यवहारिक सत्य से पारिवारिक कलह सामाजिक कलह राष्ट्रीय भेदभाव दूर होते हैं। हम शब्द से मानसिक गुलाम बन जाते हैं। इतिहास कानून विज्ञान सबका मूल धर्म है। अहिंसा द्रव्य रूप में पालन करते हैं परंतु भाव रूप में नहीं करते। प्रमाद से सोचना बोलना आगम पढ़ना लिखना आदि भी हिंसा हैं।
एक लोकक्ति के माध्यम से कहा”सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप जाके हिरदे सांच है ताके हिरदे आप” सत्य भी हित कर होना चाहिए। संसारी लोगों को पसंद करने का कुछ भी प्रयोजन नहीं। बंधु जन तुम्हारा कोई उपकार नहीं करते। संसार के कुटुंबी जन ही इस जीव के बेरी है। विवाह बंधन मैं डालने वाले परम बेरी हैं। जीव कोल्हू के बैल की तरह भाव हिंसा द्रव्य हिंसा करता रहता है। देखा हुआ सुना हुआ बोलना भी असत्य है। लोगों के अनुसार बोलना भी असत्य है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जीव सामाजिक बंधन में है। ब्रह्मचारी भी ग्रह में रहते हैं तो सामाजिक बंधन में होते हैं। बछड़ा जिधर जाएगा गाय उधर ही जाएगी। भले वह रस्सी से बंधी हुई न हो क्योंकि वह मोह से बंधी हुई है। कानून राजनीति विज्ञान मनोविज्ञान सांसारिक प्रत्येक जीव सामाजिक बंधन से बंधा हुआ है। मोही जीव धर्म भी करता है तो मोह से बंध करके करता है। त्याग भी करता है तो मोह से बंध कर के करता हैं। मात-पिता भी शत्रु है क्योंकि धर्म मार्ग में नहीं लगने देते हैं। तीर्थंकर आत्मा से परमात्मा बनने का परम आध्यात्मिक सत्य स्वीकार करते हैं। हम स्वयं अमृत हैं स्वयं भगवान हैं स्वयं की शक्ति को हम पहचान नहीं पाए हैं। आचार्य श्री परिचय करवा रहे हैं।जिस प्रकार आकाश से बड़ा कोई द्रव्य नहीं वैसे ही सत्य से बड़ा कोई नहीं। लोग साधु को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं परंतु साधु की क्रिया लोगों से बिल्कुल विपरीत होते हैं। क्योंकि वह संसार घटाना चाहते हैं। जीव जिस अवस्था में रहता है उसे ही अच्छा मानता है चाहे वह नाली का कीड़ा ही क्यों ना हो। परम सत्य आत्मा के मृत्यु नहीं होती। आत्मा को परमात्मा बनाने का परोपकार गुरु करते हैं। यह सबसे बड़ा परोपकार है। सत्य के पालन में साधु कठोर रहते हैं। वज्र से भी कठोर सत्य पालन मैं कठोर रहते हैं परंतु क्रूर नहीं रहते। साधु किसी प्रकार का आरंभ, आर्थिक प्रयोजन ,परिग्रह नहीं करते हैं। दूसरों के दुखों से दुखी होते हैं। दुख दूर करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। सिहासन से भी राग होना बंधन है। वह किसी प्रकार का बंधन नहीं चाहते हैं। दूसरों के कार्य सिद्ध करने में सदा तत्पर रहते हैं। परम सत्य आध्यात्मिक ज्ञान परम विज्ञान है।
पूज्य आचार्य ने कहा आचार्य श्री के शिष्यों की प्रथम पंक्ति में आने वाले आचार्य विद्यानंद जी गुरुदेव ने भी कहा कि जैन धर्म के अधिकांश लोग अहिंसा को परम धर्म कहते हैं,परंतु आचार्य कनक नंदी सत्य को ही परम धर्म कहते हैं। शाश्वत धर्म सत्य ही है। जो वज्र से भी कठोर है। सत्य त्रिकालीक,शाश्वती होता है। इसे कोई मिटा नहीं सकता। तीन लोक की शक्ति भी सत्य को झुठला नहीं सकते। आप सत्य की चर्चा करते हैं वह दार्शनिक तात्विक सत्य है। सत्य अनुभूति का विषय है। सत्य के बारे में बोलने पर गुरुदेव रोमांचित हो जाते हैं। महाभारत में जो सत्य का वर्णन है वह भी व्यावहारिक है। जैन धर्म वैश्विक धर्म में परम सत्य का वर्णन है। स्वयं का स्वयं की सत्ता द्वारा अनुभव करना सत्य है। सत्य को जानने पर व्यक्ति का अहंकार ममकार नष्ट हो जाता है।
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
