हम सपना तो अखंड भारत का देख रहे हैं, लेकिन हम अपने परिवार को ही अखंड नहीं रख पा रहे हैं।प्रज्ञासागर महाराज

JAIN SANT NEWS इंदौर

हम सपना तो अखंड भारत का देख रहे हैं, लेकिन हम अपने परिवार को ही अखंड नहीं रख पा रहे हैं। प्रज्ञासागर महाराज

इंदौर

तपोभूमि प्रणेता आचार्य श्री प्रज्ञासागर महाराज के उद्घोष पर  जैन समाज में बढ़ती संस्कारों की उपेक्षा व नैतिक आचरण की कमी को लेकर समाजजनों को जागरूक करने के उद्देश्य से यह चिंतन-मंथन कार्यक्रम आयोजित किया गया।  राजेश कानूनगो ने जानकारी सांझा करते कहा जैन संस्कार फाउंडेशन एवं दिगंबर जैन समाज के 115 मंदिरों की संयुक्त मेजबानी में हुए कार्यक्रम में विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख हुकुमचंद सांवला, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की कुलपित रेणु जैन, चिंतन बाकीवाला ने संबोधित किया। कार्यक्रम में नरेंद्र वेद, नकुल पाटौदी, तेजकुमार गंगवाल, पिंकेश टोंग्या, कैलाश वेद, अशोक मेहता, अनुराग वेद आदि समाजजन मौजूद थे। इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री ने जोर देते हुए कहा हम सपना तो अखंड भारत का देख रहे हैं, लेकिन हम अपने परिवार को ही अखंड नहीं रख पा रहे हैं। अखंड भारत का सपना देखने वालों को पहले खंड-खंड होते परिवारों को अखंड परिवार बनाने के लिए चिंतन व मंथन करना बहुत जरूरी है। परिवार अखंड होगा तो समाज अखंड होगा और समाज अखंड हुआ तो राष्ट्र स्वत: ही अखंड हो जाएगा।

इन बिन्दुओ पर किया गया मंथन

पूज्य आचार्य संघ के क्षुल्लक 105  प्रमेयसागर महाराज ने बताया कार्यक्रम में अनेक सामाजिक कुरीतियों पर विचार मंथन हुआ, जिसमे
नैतिक पतन का कारण क्या हैं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
{ युवा पीढ़ी धर्म से दूर क्यों भाग रही है, कहीं इसके पीछे हमारी भूमिका तो नहीं है।
{ बच्चे संस्कारहीन क्यों हो रहे हैं, इसमें हमारी कितनी गलती है।
{ समाज में शराब-मांसाहार जैसी प्रवृत्ति क्यों पनपने लगी है, इसके पीछे क्या कारण है।

{ बड़े-बुजुर्ग उपेक्षित क्यों हो रहे हैं, क्यों वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है।
{ लव मैरिज और आत्महत्या के साथ ही तलाक जैसी बुराइयां क्यों बढ़ रही हैं, इन सबका जिम्मेदार कौन है। इसके साथ ही झगड़ा, वैमनस्यता, टूटते घर-परिवार, नशे की लत से लिप्त युवा, एंटरटनेमेंट और इंटरनेट के जाल में फंसते हमारे बच्चे जैसी कुरीतियों पर भी विचार व मंथन किया गया।

समाज की चिंता को मैंने अपनी चिंता माना है। आचार्य श्री
पूज्य आचार्यश्री ने आगे कहा- साधु जीवन में वैसे तो चिंता करने जैसा कोई कार्य नहीं, लेकिन मेरी चिंता समाज का होता पतन है। समाज की चिंता को मैंने अपनी चिंता माना है। मंदिर नवीनीकरण व निर्माण, धर्म की प्रभावना, साधु-साध्वियों के विहार में श्रावक-श्राविकाओं की भी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन कहीं न कहीं संस्कार समाज से पीछे होते जा रहे हैं।

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *