स्मृति के झरोखे से 12 जून 2016 वात्सल्य वारिधि का अद्भुत वात्सल्य।
यूँ तो जिनका नाम ही वात्सल्य वारिधि हो उनके वात्सल्य का क्या गुणगान किया जाए पर 12 जून 2016 की शाम को एक ऐसी घटना हुई थी मानो वात्सल्य वारिधि उपमा भी आचार्य श्री के वात्सल्य का गुणगान करने के लिए बौना लगने लगी।शाम का समय था आचार्य श्री का आमला से विहार शुरू हुवा। गंतव्य स्थान की दुरी लगभग 5.5 किमी थी। ऊपर से सूर्य सम्पूर्ण कलाओं के साथ आचार्य देव के दर्शन को आतुर थे तो नीचे से धरती अपनी तपन से मानो ये बताना चाहती थी की सूर्य से ज्यादा तपन उसके अंदर है। सूर्य मन्द गति से अस्ताचल की और गमन कर रहा था और आचार्य श्री संघ सहित गंतव्य स्थान की ओर। लगभग 4 किमी की दुरी तय करने के बाद आचार्य श्री ने देखा की संघ के कई साधु अभी बहुत पीछे रह गए है और कई बुजुर्ग साधू थक गए है। आचार्य श्री ने मन्द मन्द मुस्काते हुए देखा मानो पूछ रहे हो की अब क्या करें। संघ के बाकी साधु आचार्य श्री के मुख मंडल का तेज निहार रहे थे। इतने में आचार्य श्री ने कहा लगता है सब गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएंगे, और ऐसे बाकि साधुओं को छोड़कर हम आगे चले जाएँ ये उचित नहीं होगा। सूर्यदेव का तेज आचार्य श्री के तेज के आगे हार मान चूका था और महुड़िया की धरती भी अब आचार्य श्री के पैरों का आलिंगन पा गर्वित हो इन्तजार कर रही थी की शायद उसे रात भर आचार्य श्री सहित 37 चलते फिरते तीर्थों के पावन चरण स्पर्श करने का शौभाग्य प्राप्त हो। संघस्थ लोगों ने निवेदन किया की हम सब आगे बढ़ते है बाकी सब आजायेंगे। आचार्य श्री ने वात्सल्यता अनुकम्पा बरसाते हुए कहा की इस प्रकार हमारा आगे जाना उचित नहीं हम सभी साधुओं और श्रावकों के साथ ही रुकेंगे चाहे यहीं रुकना पड़े। संघस्थ साधुओं और श्रावकों के प्रति आचार्य श्री का अनुपम वात्सल्य देख लोग धन्य हो उठे। और आचार्य श्री तथा समस्त संघ का रात्रि विश्राम महुड़िया के खेतों में ही हुवा। धीरे धीरे सभी साधू और श्रावक आचार्य श्री के पास पधारे और मन्द मन्द बहती पवन के बीच रात्रि विश्राम हुवा।
धन्य है ऐसे गुरुवर। धन्य है ऐसा वात्सल्य।
संकलित संस्मरण अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
