राजस्थान मेवाड़ के सपूत और भारत के विश्वधर्मरत्न का 76 वा अवतरण दिवस
आचार्य श्री आदिसागर जी महाराज के महाप्रभावक शिष्य 20 वी सदी के श्रेठतम महाऋषयो में शुमार आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी ऋषिराज के सुशिष्य
परमपूज्य गणधराचार्य श्री कुन्थुसागर जी गुरुदेव
1.वर्तमान में उपस्थित सभी दिगम्बर जैन आचार्यो मे सबसे पहले दीक्षित महासन्तो में से एक
2.गणाधिपति गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी व स्थिवराचार्य श्री सम्भवसागर जी ऋषिराज द्वय सन्तो की सन 1967 में एक ही दिन एक ही स्थान पर दिक्षा हुई जो वर्तमान में विराजित सन्तो में से सबसे वरिष्ठ क्रम है*
3.पूज्य गुरुदेव वर्तमान के वो दुर्लभ दिगम्बर आचार्य हे जिनके दीक्षा के 50 वर्ष हों चुके है*
ऐसे दीर्घकालीन साधनारत गुरुदेव के सम्बन्ध में हमारी स्मृति
मेरे नगर चितरी का कण कण पवित्र हे जहा ऐसे महागुरु के चरण पड़े हे
वो काल धन्य था जब ये महागुरु पधारे थे

हमारे नगर चितरी के दिगम्बर जिनालय के मानस्तम्भ की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सन् 1994 में इन्ही परमपूज्य श्री कुन्थुसागर जी गुरुराज के सुसानिध्य में सम्पन्न हुई थी
आज भी वो क्षण याद हे जब पंचकल्याणक का पहला ही दिन था और मौसम का मिजाज बदलने लगा हवा की गति बढ़ने लगी ऐसा लगने लगा जैसे तेज तूफ़ान आ रहा हो
ओर इस तरह हवा की रफ़्तार बढ़ने से सभी लोगो की धड़कने भी बढ़ने लगी की कहि ये सब सारा टेंट तम्बू उखड़ जाएंगे
सारे तामजाम बिखर जाएंगे प्रतिष्ठा के रंग में भंग हो जाएगा
सभी लोग में व्याप्त इस तरह के डर के बिच मंच पर आचार्य श्री खडे हुए और अपने हाथो में सरसो के दाने लेकर मन्त्र पूर्वक उन दानो को चारो दिशाओ में फेक दिए
और कुछ ही समय में मौसम ऐसा शांत हो गया जैसे वो गुरु आज्ञा को स्वीकारकार शांतचित्त हो गया हो
ऐसे सहसा परिवर्तन को देखकर पांडाल में मौजूद सभी लोग दिगम्बर मुनि के इस साधना अतिशय को देखकर जयजयकार करने लगे
इसी पंचकल्याणक की समाप्ति के बाद मन्दिर जी में एक लघु शांतिविधान रखा गया तब मन्दिर जी के मुख्य द्वार पर अचानक मधुमखियो का बहुत बड़ा झुंड आकर छत्ते के रूप में मंडराने लगा
समाज के सभी लोग और आचार्य श्री ससंघ मन्दिर के अंदर विधान कक्ष में पूजा कर रहे थे
ऐसी घड़ी में कक्ष के अंदर वाले बाहर नही आ सके और बाहर वाले अंदर नही आ सकते थे क्योकि मुख्य द्वार पर मधुमक्खियां ज़ोर जोर से वहा मंडरा रही थी
ऐसी विकट परिस्थिति में आचार्य श्री ने कमण्डल के जल के हल्के छीटे छत्ते पर फेके और वही बेठे बेठे अपनी पिच्छी छत्ते की तरफ करते हुए मन्त्र पढ़ा जिसके पांच मिनट के दरमियान सभी मधुमक्खियां उड़ कर शान्ति पूर्वक अन्यत्र चली गयी
इसी बिच कुछ दिनों बाद आचार्य जब वापस चितरी पधारते हे तब समाजजन विनती करते हे की स्वामी यहा मन्दिर से कुए दूर हे नगर में पानी की भी किल्लत हे कई बार सुखा पड़ता हे जिससे अभिषेक और आहार के लिए पानी में बहुत दिक्कत आती हे तो तब आचार्य श्री मन्दिर जी के उत्तर पूर्वी वाले प्रागण में एक स्थान बताते हे और वहा कुआँ खुदवाने की प्रेरणा देते हे और समाज ने भी गुरुआज्ञा को शिरोधारि करते हुए वहा कुआँ खुदवाया जहाँ सरलतापूर्वक प्रचुर मात्रा में अच्छा मिठा पानी आया
लेकिन कुछ समय बाद आसपास के भवनों में बोरवेल हो जाने से कुए का जलस्तर काफी निचे चला गया पानी भी बहुत कम हो गया तो समाज के कुछ प्रतिनिधि आचार्य श्री के पास गए और उनको इससे अवगत कराया तब स्वामी ने एक सफेद कपड़ा दिया और कहा की मूलनायक भगवान का अभिषेक होने के बाद इस कपड़े से भगवान की प्रतिमा को पोछकर इस कपड़े को कुए पर निचोड़कर विशेष मन्त्र पूर्वक इसमें निकले गन्दोधक को कुए में ड़ाल देना बन्धुओ उसके बाद कुछ दिनों में ऐसा अतिशय हुआ की आज 21 साल हो गए लेकिन कभी भी कुए में पानी का अभाव नही हुआ आजतक उसी कुए से अभिषेक -आहारदान व्यवस्था चलती हे
पूज्य गुरुदेव ने नगर में सभी वर्गो की भक्तिभावना को देखते हुए पंचकल्याणक में पधारे हुए उनके भक्त तत्कालीन शिक्षामंत्री गुलाबचन्द कटारिया जी को नगर हित में घोषणा करने की आज्ञा दी जिससे हमारे नगर में सीनयर सेकेण्डरी विद्यालय के नए भव्य भवन की घोषणा हुई जिसका शिलान्यास भी पूज्य गुरुदेव के करकमलो से हुआ जहा बने विद्यालय का लाभ आजतक सभी नगरवासी ले रहे हे
ऐसे जगत उपकारी महागुरु कुन्थुसागर जी गुरुदेव जब भी इस भारत भूमि में घुमे तो उन्होंने जन का तो कल्याण किया ही लेकिन साथ साथ अनेक महाप्रतिभावान धर्मधुरन्धर इस दिगम्बर जैन धर्म को दिए
जिनमे सबसे विलक्षण नायाब रत्न वैज्ञानिकधर्माचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुदेव
आचार्य श्री पद्मनन्दी जी गुरुदेव
आचार्य श्री देवनन्दी जी गुरुदेव
आचार्य श्री कुशाग्रनन्दी जी गुरुदेव
आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी गुरुदेव
आचार्य श्री गुणधरनन्दी जी गुरुदेव व
अन्य कई आचार्य
गणिनी आर्यिका राजश्री माताजी
गणिनी आर्यिका क्षेमश्री माताजी
गणिनी आर्यिका क्षमा श्री माता जी
आर्यिका श्री आस्थाश्री माता जी
सहित सैकड़ो मुनि आर्यिका रूपी नक्षत्र उदयमान हे जो आज इस भारत भूमि पर धर्म की गंगा बहा रहे हे
ऐसे महाऋषि गणधराचार्य श्री कुन्थु सागर जी महागुरुराज के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन
जय जिनेन्द्र
शब्दसुमन-मधोक जैन चितरी
