हिंस धातु से हिसा शब्द निकला कनकंनदी जी
गलियाकोट
विगत 1 माह से भक्तामर विधान चल रहे भक्तामर महामंडल विधान का समापन गुरुवार को हो गया। अंतिम दिन का यह लाभ भानु कुमार, कमल कुमार, दिलीप कुमार, रामणलाल गोदावत के परिवार को मिला। भक्तामर विधान में श्रीफल सहित अर्घ समर्पित किए गए।



बड़ी संख्या में भक्तो ने भाग लिया। मंडल विधान में शांता देवी, मीना, दीपिका विजयलक्ष्मी, हेमलता, मंजुला,मधु, दीपिका शाह, ममता, शर्मिला,आरती, प्रीति बाला,आनंदी, रेशमा,निशा, कोकिला आदि ने विधान में बढ़ चढ़कर लाभ लिया
इसके साथ ही वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने हिंसा का सुक्ष्म विश्लेषण करते हुए बताया कि हिंस धातु से हिंसा शब्द निकला है। जीव आत्मा की हिंसा स्वयं आत्म परिणाम से ही करता है। जीव अनादि काल से आत्मा की हत्या ही करता आया हैं। झूठ बोलना, चोरी करना, राग, द्वेष ,प्रमाद आदि हिंसा का ही रूप हैं। आत्म परिणाम की हिंसा ही प्रमुख हिंसा हैं। एक पाप में अन्य सभी पाप तथा एक पुण्य में अन्य सभी पुण्य गर्भित होते हैं। जिस प्रकार व्यक्ति का कान पकड़कर झुकाते हैं तो उसका पूरा शरीर झुक जाता है। आत्मा में दुष्ट परिणाम आना अवश्य हिंसा है। जिस प्रकार मूल काटने पर वृक्ष की पत्तियां सूख जाती है वैसे ही आत्मा में दुष्ट परिणाम, संक्लेश भाव से पाप बंध जाता है। दिल दुखाने से भी अधिक पाप भाव दूषित करने से होता है
जहां प्रमाद है वहां निश्चित रूप से हिंसा होती है। चार प्रकार की विकथाएं प्रमाद हैं। विकथा करने वाले हिंसक हैं। जहां क्रोध मान माया लोभ हैं वहां भी हिंसा ही है। पंच इंद्रियों का दास बनना भी हिंसा हैं। इंद्रियों में आसक्ति इनका दुरुपयोग है, इंद्रियों का सदुपयोग करना चाहिए । जहां आत्मविश्वास, आत्मा वैभव, समता, शांति, आनंद, तृप्ति, पवित्रता नहीं है तथा क्रोध मान माया लोभ आदि विभाव हैं। वहां भाव प्राण नष्ट होते हैं। यह भाव हिंसा ही है । स्वयं के भावों से स्व भावों की हत्या करना आत्महत्या बहुत बड़ा पाप है। भाव में मलिनता, ज्ञान में मलिनता, पवित्र भावों में मलिनता हिंसा है। संक्लेश, राग, द्वेष से भाव प्राणों की हिंसा होती है। पांच इंद्रियों, 3 मन वचन काया बल,श्वासोश्वास,आयु 10 प्राण हैं । जो भाव से अहिंसक होगा उससे द्रव्य हिंसा होगी ही नहीं । परिणाम प्रधान है । परिणाम विशेष से भाव अशुद्ध होने से द्रव्य हिंसा नहीं करने वाला भी हिंसक है । आत्मा में मलिनता, क्षोभ, अशांति आने पर आत्मा की हत्या अनवरत रूप से करते हैं। भाव दूषित होने पर पहले स्वयं की आत्मा की हत्या करेगा । बाद में दूसरे की हिंसा करें या ना करें । अधिक कषायो से युक्त कषायवान कषायी है। वास्तविक अहिंसा को कोई जानते नहीं है। भाव दूषित होने पर अभिव्यक्त करें या ना करें परंतु वह हिंसक है । पेड़, मधुमक्खी, चीटियां, दीमक आदि भी केमिकल छोड़कर एक दूसरे को संदेश देते हैं। वह अधिक भाव हिंसा करते हैं। निगोदिया जीव दिखाई भी नहीं देते परंतु सबसे अधिक भावो की कलुषता से पाप करते हैं। विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
