धर्म ज्ञान के बिना समस्त ज्ञान लौकिक है आचार्य कनकंदी
गलियाकोट
कलिकाल समंत भद्र आचार्य कनक नंदी गुरुदेव की अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का मंगलाचरण उनके द्वारा रचित कविता “विद्या तेरी धारा अमृत झर झर बहती जाए” का मंगलाचरण सुविज्ञ सागर जी के मधुर कंठ से हुआ । कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि स्व आत्म
धर्म के ज्ञान के बिना समस्त ज्ञान लौकिक हैं। जिससे राग द्वेष कम हो तथा अध्यात्म में रुचि हो वह ज्ञान है। आत्म हित पूर्वक ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होती हैं। लौकिक ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान से विपरीत हैं। लौकिक ज्ञान में अध्यात्मिक ज्ञान जोड़ने पर सम्यक ज्ञान हो जाता हैं। जो आत्मा हित के लिए नहीं हैं। वह संपूर्ण ज्ञान सम्यक ज्ञान नहीं हैं। स्वाध्याय से सबका शुभ उपयोग होता हैं। सम्यक के 8 अंगों से युक्त आत्म हित के लिए युक्ति युक्त ज्ञान सम्यक ज्ञान हैं। यह आत्मानुचरण आत्मज्ञान से युक्त होता है। सम्यक ज्ञान से समता, शांति आती है। इससे आत्म हित अनिवार्य है। जिस प्रकार बल्ब जलाने पर प्रकाश फैलता हैं। उसके साथ ही अंधेरा दूर हो जाता हैं। वैसे ही सम्यक श्रद्धा के बाद सम्यक ज्ञान होता है। मिथ्या दृष्टि का ज्ञान मिथ्या होता है।
सम्यकत्व के बिना गुरु वचन भी विपरीत लगते हैं। सबसे पहले आत्मविश्वास होना आवश्यक है। गुरु निंदा से ज्ञान हानी तथा घाती कर्म का बंध होता है। सम्यक दर्शन के बिना सम्यक ज्ञान नहीं होगा । जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष नहीं हो सकता । सम्यक दृष्टि, संकीर्ण दृष्टि से, पंथ, मत से नहीं अनेकांत दृष्टि से देखता हैं। अनध्यवसाय के कारण सही गलत का निर्णय नहीं होता । आत्म स्वरूप को निश्चित, निर्णीत करना चाहिए। आत्मा में दृढ़ श्रद्धा होनी चाहिए। दर्पण में हम रोते हुए देखते हैं तो रोने का ही प्रतिबिंब आता हैं। उसी प्रकार सम्यक दर्शन होने पर ही सम्यक ज्ञान होता हैं। कोई ग्रंथ उठा कर पढ़ लेना, रट लेना स्वाध्याय नहीं है, उचित काल में, विनय पूर्वक ग्रंथ लेकर, प्रतिज्ञा पूर्वक कुछ न कुछ नियम लेकर स्वाध्याय करना चाहिए। स्वाध्याय का अर्थ स्व अध्ययन होता हैं। स्वाध्याय से आत्म हीत होता हैं। जिनवाणी का पवित्र भाव से, बिना मायाचारी से, बहुमान पूर्वक विनय करना चाहिए। बहुमान का अर्थ जितने गुण हैं, उससे भी अधिक गुणगान करना चाहिए।
पूर्व संस्कार के कारण अनेक लोग विनय नहीं कर पाते हैं। आचार्य विद्यानदी
इस वेबिनार में आचार्य कनक नंदी गुरुदेव के शिष्य आचार्य विद्यानंद जी गुरुदेव ने कहां की पूर्व संस्कार के कारण अनेक लोग विनय नहीं कर पाते हैं। क्रूर तिर्यचं गति से आने वाले जीवो में विनय नहीं होता हैं। विनीत ही शिष्य का दूसरा नाम हैं। वह भद्र, सरल परिणामी, विनयवान होने से विनय भी विद्यार्थी को कहते हैं। वह गुरु की बात श्रद्धा से स्वीकार करता है। गुरु जिस प्रकार विनय करते हैं वैसे ही शिष्य मे भी वह गुण आते हैं। विनय तथा वैयावृत्ति अभ्यंतर गुण हैं। विजय लक्ष्मी गोदावत प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
