सम्यकत्व के बिना यह जीवन पाषाण के समान भार स्वरूप है कनकनन्दी

गलियाकोट
सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव तथा आचार्य भगवंत श्री मृदु रत्न सागर जी श्री संघ के सानिध्य में स्वर्गीय श्री मांगीलाल जी भंडारी की पुण्य स्मृति के उपलक्ष में सिद्धचक्र महा पूजन विधान हुआ । पुनर्वास कॉलोनी, बोडीगामा, डूंगरपुर आदि सभी के गुरु भक्तों ने भाग लिया। साथ ही सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने मंगलाचरण किया।

आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि सम्यकत्व के बिना यह जीवन पाषाण के समान भार स्वरूप है । उन्होंने कहा चुप रहना मौन नहीं हैं। वर्तमान में सभी बाह्य चारित्र को ही महत्व देते हैं, परंतु अंतरंग चारित्र मुख्य है। बाह्य तप पाषाण के समान भारी है।वह जीव को डूबा लेगा.। मिथ्या ज्ञान मोह के कारण होता हैं। आत्म विशुद्धि, समता रहित धर्म अधर्म है। क्रमबद्ध अवस्थित ज्ञान को विज्ञान कहते हैं । आत्मा के हित के लिए आत्मा की उपासना करनी चाहिए । आठों अंगों सहित सम्यक दर्शन होने के बाद सम्यक ज्ञान होगा । पहले हम सब आत्म हित नहीं करते धे । क्योंकि आत्मा को जानते ही नहीं थे । आचार्य श्री ने कई वर्षों तक बच्चों को अधिक पढ़ाया, परंतु फ्री ज्ञान को तथा आध्यात्मिक ज्ञान को परिवार के लोग नहीं समझ पाते थे। अतः अब गुरुदेव जो बच्चे रुचि से पढ़ते हैं उन्हें ही पढ़ाते हैं । सर्वज्ञ के द्वारा प्रतिपादित आगम, तर्क, प्रमाण, परीक्षण, निरीक्षण ,विवेक पूर्वक आत्म हित के लिए नहीं करते हैं।
आम्नाय के साथ
युक्ति लगाना, परीक्षण, निरीक्षण करना, समता में रहना, शांति में रहना मुख्य रूप से आत्मा की उपासना हैं। आत्म हित के लिए किया गया ज्ञान सम्यक ज्ञान हैं।
जानकारी देते हुए विजयलक्ष्मी गोदावत ने बताया की पुनर्वास कॉलोनी में आचार्य श्री संघ के सानिध्य में 16 दिवसीय श्रुत स्कंध विधान, एवम एक माह से भक्तामर विधान तथा रात्रि को भक्तामर मंत्र कि दीपक पूर्वक आराधना की जा रही है
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
