भाषा को संस्कार की जननी कहा गया है आदर्शमति माताजी

JAIN SANT NEWS अशोक नगर

भाषा को संस्कार की जननी कहा गया है आदर्शमति माताजी

अशोकनगर

भाषा को संस्कारों की जननी कहा गया है, भाषा सिर्फ भाषा नहीं है, भाषा संस्कारित शिक्षा का आधार है। भाषा अपने पीछे पीछे संस्कृति को साथ लातीं है। ख़ान, पान,रहन, सहन
बोलचाल, आचार, विचार उसी संस्कृति के अनुसार बनते चलें जातें हैं जिस भाषा में हम अपने बच्चो को शिक्षा दिला रहे हैं। अंग्रेजी शिक्षा लेने वाले बच्चो होलिवुड की फिल्म और कल्चर को देख कर उन्हीं संस्कारों को ग्रहण करेंगा वह कहा हमारे पुराण पुरुषों संस्कृति को समझेगा, वह तो विदेशी भाषा के साथ विदेशी संस्थागत संस्कारों से प्रभावित होकर अपनी मूल संस्कृति से दूर होता चला जायेगा
इसलिए आज हमारी अपनी भाषा को अपनाने की आवश्यकता है।
उक्त विचार राष्ट्रीय प्रतिभा स्थली के सेमिनार को संबोधित करते हुए आर्यिकारत्न श्रीआदर्श मति माताजी ने व्यक्त किए। मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय जैन धुर्रा ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दृष्टिकोण को जन जन पहुंचाने, और मातृभाषा के प्रति जागरूकता लाने के लिए देशभर की प्रतिभा स्थली की बहनों का व्रहद समागम आर्यिका रत्न श्री आदर्श मति माता जी ससंघ के सानिध्य में हो रहा है। इस हेतु रामटेक, नागपुर महाराष्ट्र संस्कारधानी, जबलपुर, डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़,इन्दौर,ललितपुर उत्तर प्रदेश, सहित अन्य स्थानों से शिक्षाविद विदुषी बहनो का ब्रहद समागम हो रहा है।

अपनी भाषा में छात्र विषय को आसानी से समझ सकते हैं

डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ प्रतिभा स्थली की प्रिंसिपल विदुषी बहन नीरज दीदी ने बताया कि अपनी भाषा में छात्र विषय को आसानी से समझते और प्रस्तुत कर सकते हैं। जबकि किसी अन्य विदेशी भाषा में उन्हें अपने विचारों को प्रस्तुत करने में बाधा होती है। इस बात को साइकोलॉजिस्ट शिक्षाविद और सभी देश के विद्वान स्वीकार करते हैं। लेकिन विदेशी भाषा का आग्रह और आकर्षण होने के कारण हम अपने बच्चों को विदेशी भाषा में ही शिक्षा लेने के लिए बाध्य करते हैं। जिससे न केवल उनका मानसिक विकास अवरुद्ध होता है, बल्कि वह विचारों को अपने विचारों को व्यक्त न करने की वजह से ग्रंथियों से ग्रस्त हो जाते हैं ।

हमें जागृत होकर चिंतन मंथन करने की आवश्यकता है

समागम में बड़ी दीदी ने कहा कि सारे विश्व में ऐसे कई विकसित देश हैं, जो अपनी भाषा में शिक्षा दे रहे हैं। और तकनीकी आदि सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। अब हमें जागृत होकर के चिंतन मंथन करके और अपनी ही भाषा में शिक्षण संस्था शिक्षण हो ऐसा निर्णय करना होगा। तभी हम अपनी संस्कृति को और अपने नई पीढ़ी के विकास को सही दिशा में आगे कर पाएंगे। ऐसे शिक्षण संस्थानों को हमें प्रोत्साहित करना होगा। और उन्हें ऐसे शिक्षण संस्थानों को खोलना होगा। तथा वही अपने बच्चों को भेजकर शिक्षा और संस्कारों को देना होगा। जहां मातृभाषा और संस्कारों की शिक्षा संभव हो

अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *