जैन धर्म तीर्थ यात्रा

जैन धर्म तीर्थ यात्रा यात्रा

जय जिनेन्द्र मित्रो, आज की भाववन्दना एक ऐसे स्थान की है, जिसके बारे में जानकर आप तिहुँलोक में वीतरागी भगवान की महिमा व शाश्वत जिनशासन के महाघोष को जान पाएंगे।

जैन आइये चलते हैं, जिनशासन का परचम लहराती राजगृही के बैभारगिरी में बनी सोनभण्डार नामक गुफा में जहां निश्चयनय से तो जिनधर्म का खजाना भरा पड़ा है, व व्यवहार नय से राजा बिम्बिसार का लौकिक स्वर्ण भंडार की किवदंती प्रचलित है।

राजगृही नगर में विशाल वैभार गिरि की तलहटी में एक छोटा सा परिसर है जिसके अन्दर दो गुफाएं दिखाई पड़ती हैं। घने जंगल के बीच से सड़क से होता हुआ यह रास्ता सोनभण्डार को गया है ।

सोन भण्डार की दोनों गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में जैन मुनि वैरदेव ने करवाया था। ये गुफाएं जैन तपस्वियों की साधना स्थली थीं। किंवदंती है कि मगध नरेश बिम्बिसार का खजाना इन गुफाओं में छ्पिाया गया था। इसी कारण इन्हें स्वर्ण भण्डार या सोन भण्डार के नाम से जाना जाता है। यह दुर्लभ गुफा जैन धर्म के मुनि श्री वैरादेव द्वारा संरक्षित थी वह इस स्थान पर तप व ध्यान साधना करते थे ।ऐसा माना जाता है चट्टान पर शंख लिपि में अंदर के कमरे को खोलने का रहस्य छिपा है। गुफाओं पर सोनेनुमा पेंट किया गया है, जो सदियों से संरक्षित है। माना जाता है कि यह असली सोने की पर्त है।शंखलिपि एक रहस्यमयी भाषा में लिखी जाती थी। वैसे उस समय की प्रमुख भाषा ब्राह्मी थी, जो भगवान श्री १००८ आदिनाथ के समय से ही व दुनिया की सबसे पुरानी लिपियों में से एक है। यह शंखलिपि इसी भाषा का संशोधन था। इस लिपि को समझने का एक मात्र साधन जैन शास्त्रों में विदित था, पर दुर्भाग्य से, कुछ आक्रमणकारियों द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने के बाद यह समझना ही दुर्लभ हो गया। कहते हैं, नालन्दा विश्वविद्यालय में इतने जैन शास्त्र थे, जो तीन महीनों तक जलते रहे ।

सोन भंड़ार गुफ़ा के पास ऐसी ही एक और गुफा है जो दोमंजिला थी जिसमें जैन तीर्थंकरों की प्रतिमायें स्थापित थीं। जो कि आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इसका सामने का हिस्सा गिर चुका है। इस गुफा की दक्षिणी दीवार पर 6 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां उकेरी गई है। जैन तीर्थंकरों श्री १००८ पद्मप्रभ भगवान, श्री पार्श्वनाथ भगवान, श्री महावीर भगवान और अन्य कई जैन प्रतिमाओं की सुंदर छवियां हैं, जो दक्षिणी दीवार पर उकेरी गई हैं। स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि बिम्बिसार के खजाने तक पहुंचने का रास्ता वैभवगिरी पर्वत सागर से होकर सप्तपर्णी गुफाओं तक जाता है, जो सोन भंडार गुफा की दूसरी ओर पहुंचती है। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने एक बार तोप से खजाने के दरवाजे को तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन वो इसे तोड़ नहीं पाए। तोप के गोले के निशान आज भी दरवाजे पर मौजूद हैं। जिस पर्वत में यह गुफा स्थित है उसमे गर्म पानी के स्त्रोत हैं यानी कि गंधक, अभ्रक तथा अन्य खजिनो का भंडार है। सोन भंडार गुफा में दो कक्ष बने हुए हैं। ये दोनों कक्ष पत्‍थर की एक चट्टान से बंद हैं। कक्ष सं. 1 माना जाता है कि सुरक्षाकर्मियों का कमरा था जबकि दूसरे कक्ष के बारे में मान्‍यता है कि इसमें सम्राट बिम्बिसार का खजाना था। कहा जाता है कि अभी भी बिम्बिसार का खजाना इसी कक्ष में बंद है। सोन भण्डार गुफा मे प्रवेश करते ही 10.4 मीटर लम्बा, 5.2 मीटर चोडा तथा 1.5 मीटर ऊंचा एक कक्ष आता है, यह कमरा खजाने की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए था। सोनभंडार गुफा के बारे में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पहले सर्वेयर अलक्जेंडर कनिंघम से लेकर फ्रांसिस बुकानन तक ने लिखा है। फ्रांसिस बुकानन ने 1811-1812 के बीच राजगीर का भी दौरा किया था। इसे क़िताब के रूप में छापा गया है। नाम है, ‘ऐन अकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ बिहार एंड पटना।’ इसमें वह लिखते हैं, ‘राजगृह में जैन धर्मावलंबियों की पूजा करने की एक ही अतिप्राचीन थी ।

इस क्षेत्र के दर्शन कर एक ही भाव मन में आता है, कि —-

“जिनशासन बडा निराला, मानो अमृत का प्याला”

संकलनकर्ता

सुलभ जैन (बाह)

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