संसार की परिवर्तनशीलता पर विश्वास रखिए। संभवसागर महाराज
खुरई
पूज्य निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज सानिध्य मे महती धर्म प्रभावना हो रही वही मुनि श्री के विगत दिनों से मूकमाटी महाकाव्य वाचना हो रही है शुक्रवार की प्रातः बेला मे प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर मे बोलते हुए मुनि श्री ने कहा जो हो गया वह होना ही था ऐसा विचार करना चाहिए। हमेशा सहज जीवन जीना,व सम्मान और अपमान में भेद नही करना, उन्होने सीख देते हुए कहा प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्थाओं में विश्वास रखिए। एवम संसार की परिवर्तनशीलता पर विश्वास रखिए। एक पंक्ति के माध्यम से समझाया की बीती ताहि विसार दे, वाला रवैया रखिए, हमेशा परिस्थितियों से समझौता करना सीखें।
उन्होने स्मरण दिलाते हुए कहा की याद रखें चिंता घुन है और चिंतन धुन, चिंता स्वयं समस्या है ऐसा विचार करें और चिंता नहीं चिंतन करें। उन्होंने यह भी कहा कि जितना समय हम किसी कार्य की चिंता में लगाते हैं यदि उतना ही समय हम उस कार्य में लगाएं, तो कभी चिंता जैसी कोई चीज ही नहीं रह जाएगी। एक उदाहरण के माध्यम से इसको समझाया जैसे घुन गेंहूं को भीतर ही भीतर खोखला कर देती है, वैसे ही चिंता जिसे लग जाती है, वह उसे चिता के रास्ते ले जाती है।
इसका अंतर बताते कहा चिंता और चिता में मात्र एक बिन्दु का अंतर है लेकिन चिता तो एक बार ही जलाती है और चिंता जीवनभर जलाती रहती है। मार्मिक उद्बोधन मे कहा एक बार मरना आसान है लेकिन रोज-रोज का मरना और जलना व्यक्ति के लिए आत्म घातक है। उन्होंने कहा कि कोई भूतकाल की बातों को लेकर चिंतित है तो किसी को भविष्य की बातों की चिंता है। चिंता से उबरना है तो अपने वर्तमान जीवन के स्वामी बनिए, इसी का आनंद लीजिए। जो बीत गया सो बीत गया। क्या आप बीते हुए समय को लौटा सकते हैं। हां और जो आया नहीं है उसके लिए भी कैसी चिंता, जो कल दिखाएगा वह उसकी व्यवस्था भी देगा।
संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
