*महावीर जयंति विशेष* *वैश्विक महासंकट और प्रभु महावीर का समाधान कारी दर्शन*
भगवान महावीर का जन्म कल्याणक और उनका पावन संदेश आज ओर अधिक प्रासंगिक होकर उभर आये है *जब समस्त संसार कोरोना जैसी वैश्विक महामारी, जैविक-परमाणु युद्ध की क्रूरता और जलवायु परिवर्तन के महासंकट में फंस कर त्रस्त असहाय है।* इसी यक्ष प्रश्न का समाधान यदि निरपेक्ष होकर खोजा जाये तो सम्पूर्ण मानवता को त्राण देने वाला जैन दर्शन त्रिकाल में भी प्रासंगिक है। वस्तुतः सनातन आर्य संस्कृति सदैव से ही समस्त संसार के लिये आशा की किरण रही है । निरूपाय दुनिया आर्थिक, तकनीकी, औद्योगिक और भौतिक उन्नति के कीर्तिमान बना चुकी।बुद्धि का तो क्या कहा जाये? केवल धर्म, संयम-नियम- आचरण चूका, *धर्म जिसे जीवन में धारण किया जाना चाहिए था ,वही छूटता चला गया?* *’क्या हिंसा, पशुता, निष्ठुरता, अतिक्रमण अहंकार, क्रोध, असत्य, असंयम, दुराचार, परिग्रह आदि विकार धारणीय हो सकते हैं?’* यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति हिंसक हो जाए तो समाज के अस्तित्व पर ही संकट आ जायेगा, चहुंओर भय, अशांति, पाशविकता और मृत्यु का ताण्डव दिखायी देगा! जब असंयम, अतिसंग्रह एवं दुराचार चरम पर हो जाएंगे तो उसकी परिणति अशुभ ही होगी? नश्वर यह संसार निरन्तर निम्नता या पतन की ओर जा रहा है यह जैनागम कहते है *”संसरति इति संसार”।* ऐसे दौर में भगवान महावीर की देशना, उनका दर्शन तथा प्रतिपादन अवश्य ही संकट मिटा सकता है। भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित निम्नोक्त 5 सिद्धांत मानव को जीना सिखाते हैं जिससे वह अपने अंदर रही अनंत शांति, आनंद,करूणा,सहोदर भाव की अनुभूति कर सकें।*
1. अहिंसा :*
भगवान महावीर ने उन्मिलित नेत्रों से उद्घोषित कर कहा है कि
*‘अहिंसा परमो धर्म’।*
इस अहिंसा में समस्त जीवन का सार समाया है।
*जीव मात्र को कष्ट न देना:*
यह अहिंसा का सबसे स्थूल रूप है जिसमें हम किसी भी प्राणी को जानते — अनजाने अपनी काया द्वारा हानि नहीं पहुंचाते। मानव जीवन की विशेषता यही है कि वह चाहे तो मनसा वाचा कर्मणा दूसरों को कष्ट से बचा सकता है। अतः स्थूल रूप से अहिंसा को स्वीकार करने वाला किसी को भी पीड़ा, चोट, घाव आदि नहीं पहुँचाता।
*अनिष्ट नहीं सोचना* :
यह अहिंसा का सूक्ष्म स्तर है जब अभ्यास पूर्वक जीव मात्र के भी लिए अनिष्ट, बुरा, हानिकारक नहीं सोचना संभव हो जाता है। हिंसा से पूरित मनुष्य सामान्य रूप से दूसरों को क्षति पहुँचाने के वृत्ति से भरा होता है,जिसका चिन्तन के स्तर पर रहना कैसे लाभकारी हो सकता है?
*वैर न करना:*
अहिंसा के सूक्ष्तम स्तर पर अवैर भाव का बौद्धिक विकास होते जाने से जीवन में आने वाली किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति घृणा के भाव का त्याग हो जाता है। वास्तव में मानव मन अपने आस-पास रही उन वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों के प्रति घृणाभाव से भरा रहता हैं जो विपरित हों अथवा जिसे हम अपने अनुकूल न बना पा रहें हों। यह घृणा की भावना हमारे भीतर अशांति, क्रोध,दुःख असंतुलन व असामंजस्य उत्पन कर अंततः हिंसा को जन्म देती है।जीवन में रही विपरित वस्तु-व्यक्ति- परिस्थिति को हटाने का प्रयत्न नहीं करें अपितु उनके प्रति रहा अपना घृणा भाव हटाये। जब निर्झरित अनंत करूणा आकार ले लेती है तब हिंसा को कहां स्थान मिल सकता है।
*यदि मन- वचन -काया के योग से ऐसा संभव होता तो न अनंत पशुता भरा मांस भक्षण होता तथा न ही कोरोना जैसा महासंकट होता?*
अहिंसा को स्वीकार कर मानवता संघर्ष से बच सकती है,अहिंसा से ही जीव जगत की रक्षा हो सकती है। सृष्टि का कोई जीव कम या ज्यादा नहीं,सृष्टि अन्योन्याश्रित है।सब जीव अपनी स्थिति लय और आयुष्य लेकर आते है। अवैध खनन,शिकार, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई क्या रोका नहीं जा सकता मात्र अहिंसा की स्वीकार से!क्या कृषि में जहरीले दवाओं और खाद का अंधाधुंध उपयोग रोका नहीं जा सकता?*
2.सत्य*
हम सदैव ही अपने बच्चों एवं युवा पीढ़ी को सदा सत्य बोलने की प्रेरणा देते हैं किन्तु क्या हम बात बेबात झूठ नहीं बोलते? *
सत्य संभाषण का सिद्धान्त है जो गलत है उसे अस्वीकार करना।
* महावीर मन और बुद्धि को संतुलित कर जीव को अनुशासित करना चाहते है ताकि जीवन के हर मोड़ पर व्यक्ति सही क्रिया व प्रतिक्रिया का चुनाव कर सके।अतः ‘सत्य’ सिद्धांत का अर्थ है -अनुचित को प्रयत्न पूर्वक हटाना तथा क्षणभंगुर को स्थायी न मान लेना।जब सत्य जीवन का सार बन जाता हैं तो सत्य मन व बुद्धि को शुद्ध करते हुए, जीवन की प्रत्येक अवस्था में हमें उचित व शाश्वत का चुनाव करने की सहज प्रेरणा देने लगता है। न्यायालयों में न्यायाधीश जैन की गवाही को सच मानते थे?जैन अपनी मूंछ का बाल गिरवी रख आपदा में धन लेकर हुण्डी लिख देता था,कोई शक न होता?सत्य को स्वीकार कर कोई मिलावट,कालाबाजारी, कामचोरी,धोखा कर सकता है क्या? केवल सत्य को ही जगत स्वीकार कर ले तो न्यायालयों के 90% मुकदमे खत्म हो जाये क्योंकि एक पक्ष तो गलत होता ही है तथा उसे यह पता भी होता है किन्तु वह नाक का सवाल बनाकर या ठगी कर कुछ लाभ पाने की कोशिश कर रहा होता है।लाभ भी कैसा जिसकी सत्ता क्षणिक और अस्थायी?*
3.अचौर्य*
भगवान महावीर प्रणीत *‘ अचौर्य महाव्रत ‘* को हम संसारी जीव अपनी सामान्य बुद्धि द्वारा दूसरों की वस्तुएँ न चुराना ही मानते हैं किन्तु केवलज्ञान युत भगवान गहन अनुसंधान का बीज मंत्र दे रहे होते है । इस महाव्रत का एक दूसरा ही गहरा प्रभावशाली आयाम है।अतः अचौर्य सिद्धांत का अर्थ केवल दूसरों की वस्तुएँ चुराना नहीं अथवा हड़पने की सोचना नहीं, मात्र इतना नहीं अपितु इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ है —
*शरीर-मन-बुद्धि को मैं नहीं मानना। मैं शुद्धचैतन्य स्वरुप हूँ तथा शरीर-मन-बुद्धि इस मानव जीवन का मात्र साधनरुप हैं जिससे हम अपने यथार्थ स्वरुप तक पहुँच सकते है*
। जैसे पानी से भरा पात्र जल नहीं है। प्यास जल से बुझती है, पात्र से नहीं। इसी प्रकार चेतना इस शरीर-मन-बुद्धि में व्यापक है परंतु वह ‘मैं’ नहीं ही है। जब चैतन्य मयी शुद्ध आत्मिक स्वरुप को जान लिया जाता है तभी “मैं व मेरा” तिरोहित हो जाता है और मानते हैं तभी अचौर्य के आचरण का पालन सहज होजाता है।चोरी न करने का संकल्प लेकर दुनिया को बाजार मानने की प्रवृति, मुनाफाखोरी, चोरी, रिश्वतखोरी सब कुछ हटाया जा सकता है।*
4. ब्रह्मचर्य*
जब कोई मानव अहिंसा, सत्य, अचौर्य को आत्मसात कर लेता है तब ब्रह्मचर्य साध सकने लायक बनता है । इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ ब्रह्म+चर्य अथार्त ब्रह्म में स्थिर होजाना।जब मनुष्य उचित का चुनाव करता है एवं अनित्य शरीर-मन-बुद्धि से ऊपर उठकर शाश्वत स्वरुप में स्थित होता है तभी वह अपनी निज सत्ता के केंद्र बिंदु पर स्थिर हो जाता है जिसे ‘ ब्रह्मचर्य ‘ कहा जाता है।जैनाचार में ब्रह्मचर्य के पालन की एक सुसंगत व्यवस्था विद्यमान है जिसे शीलव्रत कहा जाता है तथा सुश्रावक सह श्राविका आजीवन व्रत अंगीकार करते है।कुछ वर्षों पूर्व तक शीलव्रती साधक का बड़ा बहुमान होता था तथा उसे सहभार्या हाथी पर बैठाकर गाजे बाजे से समारोह कर व्रत अंगीकृत कराया जाता था। प्रायः अनेक सुधि श्रावक 50 वर्ष की वय होते ही शीलव्रती हो जाते थे। कुछ लोग तेला,अठाई ,आयम्बिल आदि का व्रत ले लेते थे। गृहस्थ जीवन केवल भोग के लिये ही है ऐसा भी नहीं था।
वस्तुतः श्रेष्ठ साधक तो गृहस्थ जीवन में ही निश्चित अनुशासन का पालन कर भावी जीवन साधना का अभ्यास करते ही है। ब्रह्मचर्य का अवलम्बन यदि साकार हो जाये तो फिर बलात्कार,छेड़छाड़, परस्त्री गमन, व्याभिचार कैसे हो सकता है?
*5.अपरिग्रह*
जो आत्म स्वरुप और उसकी विराटता को जान लेता है और शरीर-मन-बुद्धि को अपना न मानते हुए जीवन व्यतीत करता है उसकी बाह्य दिनचर्या संयमित होने लगती है। जीवन की हर अवस्था में अपरिग्रह का भाव दृष्टिगोचर होता है। अपरिग्रह के निम्नलिखित तीन आयाम हैं
*वस्तुओं का संग्रह:*
साधक का सांसारिक वस्तुओं का मोह छूट जाता है। अतः वस्तुओं की उपलब्धता अथवा गैर उपलब्धता दोनों ही स्थितियों में समान भाव रहता है तथा मानसिक व शारीरिक व्याकुलता तथा दुःख नहीं होता।*व्यक्तिओं का अपरिग्रह:*
साधक संसार को रंगमंच मानने लगता है तथा निरपेक्ष अपनी भूमिका निर्वहन करने लगता हैं।जिसे इस जीवन अभिनय का बोध हो जाता है वह चाहे जहाँ भी रहे — जनसमूह में अथवा एकांत में , हमेशा प्रसन्नचित रहता है क्योंकि उसकी शांति व आनंद बाह्य जगत से नहीं अपितु भीतर से जन्मती है। जैन जगत में परिग्रह घटाने को इच्छा परिमाण व्रत अंगीकृत किया जाता है जिसमें धन,जेवर,वाहन, भवन की इच्छा तय कर ली जाकर व्रत ले लिया जाता है।उस स्तर से अधिक संग्रह न करना व्रत बन जाता है। ऐसे अनेक दानदाता जैन समाज में है जो इच्छा परिमाण व्रत के बाद जो अतिरिक्त एकत्र होता है वह पूरा का पूरा दान कर देते है तथा अपना निजी नहीं मानते।
सारी दुनिया के सब संकटों का, मानव की रोग-प्रतिकारक शक्ति का,बढ़ते तापमान और प्रदूषण का,अनजाने संक्रामक रोगों का,बाढ़-सूखा-तुफान-ग्लेशियर का क्षरण,आतंकवाद और हिंसा का उन्माद,पर्यावरण की क्षति का – किस समस्या का समाधान निहित नहीं है भगवान महावीर के दर्शन में …….!
*अहिंसा परमोधर्मः,धर्म हिंसा तदैव च।* *तथा क्षमा वीरस्य भूषणम् सृष्टि के अंतिम क्षण तक आवश्यक और प्रासंगिक रहेंगे यह अकाट्य सत्य है।*
*आपका ही-कमल महता चित्तौड़गढ़*✍
