आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज (भिण्ड

JAIN 24 NEWS JAIN SANT NEWS आचार्य अतिवीर मुनि

13 अप्रैल – समाधी दिवस विशेष

आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज (भिण्ड)

परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज (भिण्ड) का जन्म सन 1892 में पौष शुक्ल द्वितीया तदनुसार 1 जनवरी 1892 को मोहना, जिला ग्वालियर (म.प्र.) में हुआ था| आपने सन 1941 में द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री 108 विजय सागर जी महाराज के कर-कमलों द्वारा ग्राम पाटन, जिला झालावाड़ (राजस्थान) में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण कर मोक्ष मार्ग पर अपने कदम बढ़ाये| तप-त्याग-साधना के मार्ग पर अविरल बढ़ते हुए आपको लंगोट व दुप्पट्टा भी भार स्वरुप लगने लगा| अतः आप सन 1943 में अगहन बदी पंचमी तदनुसार 16 नवम्बर 1943 को कोटा (राजस्थान) में मुनि दीक्षा अंगीकार कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर आरुढ़ हुए| मुनि रूप में आपने दिगम्बर मुनि की चर्या, उनके मूलगुणों की साधना तथा उनके तपश्चर्या के विविध आयामों से जैन समाज को परिचित करवाया|

छाणी परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री 108 विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज के प्रमुख शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने पूज्य आचार्य-प्रवर के समाधि दिवस के अवसर पर उनके चरणों में अपनी विनयांजलि अर्पित करते हुए बताया कि आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज (भिण्ड) का नाम श्रमण परंपरा के गौरवशाली इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है| आपके भीतर चारों अनुयोगों के ज्ञान के साथ-साथ आगम व अध्यात्म का ज्ञान प्रशंसनीय था| आपके उपदेशों से अनेक जिनालयों का निर्माण तथा जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा संपन्न हुई| आपने अपने जीवन काल में देश के कोने-कोने में सिद्धक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र आदि तीर्थक्षेत्रों की वंदना करते हुए अनेक प्रदेशों में पाठशालाएं, विद्यालय एवं वाचनालय खुलवाकर धर्म की अभूतपूर्व प्रभावना की| जीवन में अनेक प्रसंगों पर उपसर्गों को सहन करते हुए आप निरंतर कठोरतम चर्या का पालन करते रहे|

गृहस्थ जीवन में आप एक गुणी व विनम्र व्यक्ति के रूप में नगरवासियों के बीच प्रसिद्द थे| बेसहारा, असहाय तथा गरीब लोगों की सहायता करने में आप सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़े रहते थे| आचार्य श्री 108 विजय सागर जी महाराज द्वारा आपके भीतर विद्यमान अथाह ज्ञान भण्डार तथा अद्वितीय प्रभावना को देखते हुए हाड़ौती (राजस्थान) में आचार्य पद से सुशोभित कर आपको आचार्य श्री 108 शान्तिसागर जी महाराज (छाणी) की परंपरा में तृतीय पट्टाधीश के रूप में प्रतिष्ठित किया गया| आपके कर-कमलों द्वारा अनेकों भव्य जीवों ने जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर आत्मकल्याण के मार्ग पर अपने कदम बढ़ाये| आपने अपनी पारखी नज़रों से पूज्य आचार्य श्री 108 सुमति सागर जी महाराज की योग्यता को परखकर उन्हें छाणी परंपरा के चतुर्थ पट्टाचार्य के रूप में आसीन किया|

सन 1973 में चैत्र शुक्ल एकादशी तदनुसार दिनांक 13 अप्रैल 1973 को सांगोद, जिला कोटा (राजस्थान) में समाधिपूर्वक मरण कर इस नश्वर देह का त्याग किया| आपने अपनी समाधी की साधना 12 वर्ष पूर्व ही प्रारम्भ कर दी थी| अंत समय में आपकी समाधी में सहायक बनने हेतु आपके अनेक शिष्य एकत्रित हुए थे| पूज्य आचार्य श्री का जितना विशाल एवं अगाध व्यक्तित्व था, उनका कृतित्व उससे भी अधिक विशाल था| आपके द्वारा दीक्षित शिष्यों में प्रमुख आचार्य श्री 108 सुमति सागर जी महाराज, आचार्य श्री 108 निर्मल सागर जी महाराज, आचार्य 108 श्री कुन्थु सागर जी महाराज आदि प्रसिद्द हुए| इस गौरवशाली महान परम्परा में वर्तमान में सहस्त्राधिक दिगम्बर साधु समस्त भारतवर्ष में धर्मप्रभावना कर रहे हैं तथा भगवान महावीर के संदेशों को जनमानस तक पहुंचा रहे हैं|

संकलन – समीर जैन (दिल्ली)

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