जतारा में आदिनाथ धर्मनगरी भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव सुप्रभ सागर एवं प्रणत सागर महाराज के सानिध्य में संपन्न किया गया । प्रातः कालीन बेला में पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर से आदिनाथ भगवान की भव्य शोभायात्रा निकाली गई , जो नगर के मुख्य मार्गों से होते हुए वापस जैन मंदिर पहुंची , जहां पूज्य मुनिराजों के सानिध्य में पूर्ण भक्ति भाव से भगवान आदिनाथ का अभिषेक शांतिधारा संपन्न की गई । तत्पश्चात संपूर्ण समाज को पूज्य मुनिश्री के अमृत मई वचनों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मुनिश्री सुप्रभ सागर महाराज ने बताया कि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ थे जिनका जन्म तीसरे काल में हुआ एवं वह तीसरे • काल में ही मोक्ष पधारे । असि सैनिक कार्य , मसि लेखन कार्य , कृषि खेती , विद्या , शिल्प विविध वस्तुओं का निर्माण एवं वाणिज्य व्यापार का • ज्ञान सर्वप्रथम आदिनाथ भगवान ने ही दिया था । भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नवमी के दिन अयोध्या नगर में माता मरु देवी की कोख से हुआ था उनके पिता राजा नाभि राय थे । मुनिश्री ने कहा कि वही बांस बांसुरी बनकर संगीत सुनाता है और वही बांस किसी का सिर फोड़ देता है । सुख – दुख कोई बाहर की वस्तु नहीं है अपितु हमारी एक कल्पना मात्र है । वस्तु को या व्यक्ति को बदलने से जीवन का कल्याण नहीं होता अपितु जिसकी दृष्टि , जिसकी सोच बदल जाती हैं उसका ही कल्याण संभव होता है । अज्ञानी सुख में फूलता है और दुख में कूलता है , वहीं ज्ञानी सुख दुख में माध्यस्थ भाव रखता है । समझ शक्ति और सहनशक्ति जिसके पास है वही जीवन के आनंद को प्राप्त कर सकता है । तीव्र पुण्यात्मा ही पाप करता है पापी उतना पाप करने में समर्थ नहीं होता । दुख के दिनों में ही सुख की कीमत समझ में आती है । उन्होंने कहा मर्यादित जीवन ही कल्याण का साधन है । बांसुरी के समान सुख – दुख रूपी छिंदो को जो समझ लेता है वही अपना कल्याण कर सकता है । सुख – दुख में धैर्य को धारण करने वाले ही भगवान बनते हैं । जैन समाज प्रवक्ता अशोक कुमार जैन ने बताया कि शोभायात्रा में राजीव माची , प्रकाश रोशन , पवन मोदी , सुनील बंसल , राजेंद्र राज , आशीष माते , प्रदीप टानगा , राजकुमार दमोह , राजू सिंघई , मनोज चंदेरा एवं पाठशाला परिवार सहित बड़ी संख्या में साधर्मी उपस्थित रहे ।
