विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍

चलेमूलकथाकीओर :

गुरुवर ज्ञानसागरजी कुछ उत्तम श्रावकों के साथ चर्चा कर रहे थे। समीप ही बैठे थे विद्यासागरजी लोग गुरु की ओर देखकर नजर उठाते तो विद्यासागर के मुखमंडल पर धर देते, वहाँ से उठाते तो ज्ञान सागर के तब तक एक प्रौढ़ व्यक्ति पूछ बैठा-

“गुरुवर, आपने दीक्षा कब ली थी? प्रश्न अचानक ही रखा गया था। इसलिए सभी जन यह न समझ पाए कि प्रश्नकर्ता किसकी दीक्षा के विषय में पूछ रहे हैं-गुरु ज्ञानसागर की दीक्षा के विषय में या जिनने अभी कुछ दिन पहले दीक्षा प्राप्त की है उन विद्यासागरजी के विषय में सम्भवतः गुरु ज्ञानसागर प्रश्न के द्विअर्थी बोध को भांप गए थे, इसलिए उन्होंने पूर्ण गंभीरता से उत्तर दिया- ‘अभी-अभी।

उनके स्वस्थ उत्तर पर प्रश्नकर्ता ने कौतूहल बतलाते हुए कहा महाराज आप तो काफी समय से मुनि हैं फिर अभी-अभी कैसे?

ज्ञानसागरजी समझ गए कि प्रश्नकर्ता ने प्रश्न का संबंध विद्यासागर से काटकर मुझसे जोड़ दिया है, अतः अपने शब्दों को पुष्ट करते हुए बोले-हाँ भैया सही तो कह रहा हूँ, अभी-अभी दीक्षित हुआ हूँ। प्रश्नकर्ता आश्चर्य में पड़ गया। बोला-

महाराज सही सही बताओ। तब ज्ञानसागरजी मुस्कराते हुए बोले- अभी अभी अंदर से प्रतिक्रमण करके ही बाहर बैठा हूँ और प्रतिक्रमण का अर्थ है कि जो बुद्धि-अबुद्धि पूर्वक पाप हुए हैं, उनकी आलोचना करना, त्याग करना, त्याग का नाम ही दीक्षा है।

इसलिए साधु की दीक्षा तो हर समय हुआ करती है…! उनके इस तर्क-सिद्ध उत्तर से सभी श्रावकगण हँस पड़े। विद्यासागरजी भी हँसे बगैर न रह सके। वे जान रहे थे कि अभी-अभी कौन दीक्षित हुआ है और उत्तर किसे देना पड़ रहा है।

धर्ममय वातावरण में सात्विक मुस्काने फैल गयीं।

पोस्ट-112…शेषआगे…!!!

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *