शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
पं० भूरामलजी की सरल सात्विक प्रवृत्ति को लेकर एक सुन्दर आख्यान मिला है।
आचार्य शांतिसागरजी के पट्ट शिष्य आचार्य वीरसागरजी के संघ में पं. भूगमलजी संघस्थ साधुओं को अध्ययन कराते थे। संघस्थ साधुओं के कमंडलु में प्रासुक जल भरने वाला एक ब्रह्मचारी नियुक्त था, वह भूगमल के स्वभाव से परिचित था।
एक दिन किसी कारण वश उसे कहीं जाना था, वह अपना काम पं० भूगमल को सौंपकर वीरसागरजी को बिना बताये चला गया। एक दो दिन तक नहीं आ पाया, अतः कमंडलों में जल भरने का काम भी भूरामल ही करते रहे। जबकि वह उनका कार्य नहीं था।
एक दिन जल भरते हुए आचार्य वीरसागरजी ने उन्हें देख लिया, किसी ब्रह्मचारी के द्वारा बुलाकर कहा- पंडित जी यह आपका काम नहीं है, यह तो दूसरा ब्रह्मचारी करता है, फिर आप क्यों कर रहे हो? भूरामलजी कैसे कहने वाले थे शिकायती बात? सो बात काटकर बोले, गुरु सेवा करना तो हमारा भी कर्तव्य है। कर्तव्य तो है लेकिन वह व्यक्ति कहाँ गया? भूरामलजी कुछ उत्तर न दे सके, हाथ जोड़कर बोले महाराज अभी तो था, यहीं कहीं होगा जब तक महाराज पूरी घटना को भाँप गये कि पानी वाला ब्रह्मचारी अपना काम पं० जी को सौंपकर चला गया है, फलतः सीधे साधे पंडित जी चुपचाप काम करते रहते हैं। सो मुस्काते हुए बोले- आप तो आज मुझे भी सिखाने लगे! भूरामलजी को कहने के लिए शेष कुछ बचा भी नहीं था, सो मुस्कराते हुए चरणों में सिर धर दिया और चले गये अपने निवास की ओर…. उस दिन पूज्य वीरसागर जी मन ही मन भूरामल की सरलता, नम्रता एवं मद-रहित ज्ञान की प्रशंसा कर मुस्काते रहे।
व्यापार बनिज कर जीवन सफल बनाने वाले व्यक्ति को जीवन का साफल्य बनिज में नहीं, आवश्यकताओं में नहीं, भौतिक परीक्षाओं में नहीं दिखा। अतः धीरे धीरे अर्थ अर्जन करने वाला व्यक्तित्व ज्ञान और ध्यान अर्जन करने के पथ पर बढ़ने लगा लग गया चिन्तन-मनन में।
उसके मानस से उद्भूत शब्द-धारा ने अनेक ग्रन्थों को जन्म दिया। साहित्य और धर्म के महासागरों में अवगाहन करते हुए संस्कृत में सात दयोदय, भद्रोदय, सुदर्शनोदय, वीरोदय, जयोदय, मुनि मनोरंजन शतक और प्रवचनसार सामने आए तो हिन्दी में चौदह ग्रन्थ जैन मानस को मिले। यह सब कार्य बालब्रह्मचारी पं. श्री भूगमलजी के हाथों से संपन्न हुआ था।
पोस्ट-110…शेषआगे…!!!
