
ब्यूरो पत्रा आज पर्वराज पर्यूषण का छठवां दिन उत्तम सत्य धर्म के रूप में श्री 1008 चिंतामणी पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर धाम , पन्ना में 105 क्षु . आराधनाश्री माता जी व क्षु . श्री 105 साधनाश्री माता जी के ससंघ सानिध्य में बडी धूम धाम से मनाया गया । माताजी ने अपनी देशना में श्रावको को उत्तम संयम धर्म का संबोधन देते हुए कहा कि संयम का शाब्दिक अर्थ सम और यम संयम अर्थात सम्यक रूप से यम अर्थात नियंत्रण करना संयम है । जिस प्रकार कोई भी बहुत ही अच्छी गाडी क्यों न हो उसमें सारी सुख सुविधायें क्यों न हो परन्तु यदि उसमें ब्रेक नहीं है तो वह व्यर्थ है और अगर बिना ब्रेक के चलाते भी है तो दुर्घटना निश्चित है उसी तरह हमारा शरीर कितना भी हष्ट पुष्ट और सुंदर क्यों न हो यदि उसमें संयम रूपी ब्रेक नही है तो उस व्यक्ति का पतन होना भी निश्चित है । निश्चय से तो रागादि विकारों की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखना ही सच्चा संयम है , और व्यवहार से पंच इरद्रियों पर नियंत्रण रखना और षठकाय के जीवों की रक्षा करना ही संयम है । उन्होंने चर्चा करते हुये बताया कि संयम के मुख्यतः दो भेद है पहला इन्द्रिय संयम और दूसरा प्राणी संयम । इन्द्रिय संयम का अर्थ स्पर्शन , रसना , घ्राण , चक्षू और कर्ण इन पाॅच इन्द्रियों के २७ विषयों स्पर्शन के ८ रसना के ५ घ्राण के २ चक्षु के ५ और कर्ण के ७ के प्रवर्तन पर नियंत्रण रखना इंद्रिय संयम है।
इन पांचों इन्द्रियों के विषयों का सेवन हम अपने सुख के लिये करते है पर विचार करें कि क्या सच में हमें सुख मिलता है या मात्र सुख का भ्रम होता है वो भी कुछ ही क्षणों के लिये और इन क्षणिक सुखों के लिये हम अपनी पर्याय और आने वाली पर्याय का भी नाश कर लेते है । वहीं प्राणी संयम के बारे में बताया गया कि निगोदिया जीव से लेकर पंचेन्द्रिय तक के समस्त जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है । हम अपने छोटे छोटे स्वार्थों को पूरा करने के लिये न जाने कितने जीवों की हिंसा प्रतिदिन करते है जैसे अभक्ष्य भोजन , रात्रि भोजन , सौन्दर्य सामग्री आदि के लिये हम अनंत जीवों की हिंसा करते है ।
यदि हम चाहें तो इन इच्छाओं पर नियंत्रण करके आंशिक रूप से ही सही जीव दया का पालन कर संयम की रक्षा कर सकते हैं । जो एक सच्चे श्रावक को करना ही चाहिये । रात्रि कोलीन सांस्कृतिक कार्यक्रम में अछार अर्थात शास्त्र रखने के लिये बिछाया गया कपडा बनाओ प्रतियोगिता हुई जिसमें कई प्रतियोगियों ने हिस्सा लिया । सभी ने इतने अच्छे बनाये कि निर्णायक प्रथम द्वितीय का चयन ही नहीं कर सके और सभी को प्रथम पुरुस्कार दिया गया ।
