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#विद्याधर_से_विद्यासागर (किताब)
काशी-पढ़े पंडित के हाथों : जिन हाथों में साहित्य की चाह थमी हुई हो, वे भला व्यवसाय में कैसे खपेंगे। सो धंधे से मन का उचाट खा जाना स्वाभाविक ही था। उचटते मन को देख माता ने उन्हें संसार में रम जाने की दृष्टि से उनके विवाह का प्रस्ताव रखा उनके समक्ष ललित कलाओं से प्रदीप्त उनका मानस विवाह की बात सुन सुखानुभूति न कर सका, अतः वे प्रस्ताव को टाल गए और जीवन पर्यन्त अविवाहित रहने का संकल्प रख दिया सयानों के समक्ष।उनकी नव-सृजन की प्रेरणा श्लाघनीय है। किस्सा है कि जैन विद्वानों से अध्ययन करने के उपरांत और अधिक अध्ययन करने की इच्छा से भूरामलजी, एक अजैन विद्वान् के पास गये। उन्हें अपना मंतव्य बताया तो वे व्यंग कसते हुए बोले, जैनियों के यहाँ कहाँ है ऐसा साहित्य जो मैं तुम्हें पढ़ाऊँ क्षण भर विद्वान् भूरामलजी अचेत से हो गये जैसे काठ मार दिया हो किसी ने शब्द बाण की भाँति पर्तें चीरते हुए हृदय तक पहुँच गये। उस दिन उन्हें बड़ी टीस हुई। मन ही मन खेद करते हुए अपनासा मुँह लेकर वापस आ गए अपने निवास पर उसी दिन उन्होंने चोटी में गाँठ लगाकर संकल्प किया कि मैं अध्ययन करने के उपरांत ऐसे साहित्य का निर्माण करूँगा जिसे देखकर जैनेतर विद्वान् भी दाँतों तले अंगुली दबा लें। बीज पनपता गया, संकल्प दृढ़ होता गया, शास्त्र आराधना और आत्म साधना होती रही, फलस्वरूप जयोदय आदि कई काव्यों की सर्जना हो गई। जयोदय महाकाव्य की प्रतियाँ कुछ समय बाद बनारस भी पहुँची, जैन- जैनेतर विद्वानों को भी प्राप्त हुई। उन्हें पढ़कर विद्वानों ने कहा कालिदास के साहित्य से टक्कर लेने वाला जैन साहित्य यह है।पोस्ट-109…शेषआगे…!!!
