#विद्याधर_से_विद्यासागर (किताब)![]()
#गुरु_ज्ञानसागरजी
: ज्ञानसागरजी जितने ऊद्भटू विद्वान् थे उतने ही स्वाभिमानी थे, उनके परिचय में यहाँ कुछ बतला देना विषयानुकूल होगा- राजस्थान के राणोली ग्राम में इस महासाधु का जन्म माघमास में वि.सं. १९४८ (सन् १८९१ ई.) में हुआ था। सीकर जिला का कस्बा राणोली तब निरा देहात के रूप में पाया जाता था। पिता श्री चतुर्भुज प्रसाद छाबड़ा एवं माता श्रीमती धृतवरी / घेवरीबाई के घर, वह सौभाग्य पुष्प खिला था, जिनका परिवार सामान्य किन्तु धर्मप्रधान था। पाँच पुत्रों के मध्य ज्ञानसागरजी का स्थान द्वितीय क्रम में आता है। पुत्र के शरीर का गोरापन और लुनाई देखते हुए उसे ‘भूरा’ संबोधन दिया गया था माता-पिता व परिजनों द्वारा बाद में हुए पं भूगमलजी कौन जानता था कि बालक भूगमल जगत् का पूरा मल नष्ट करने के सूत्र देगा ?उन्हें तो बचपन से ही नैर्धन्य के थपेड़े सहने पड़े थे। फिर सहना पड़ा पितृ वियोग। ग्राम में उपलब्ध प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् उन्हें बनारस भेजा गया। जहाँ उन्होंने संस्कृत और जैन सिद्धान्त का तलस्पर्शी अध्ययन किया और निश्चित समय पर शास्त्री परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। कहते हैं वे बड़े स्वाभिमानी थे, जीवकोपार्जन हेतु कुछ न कुछ करते रहते थे। कुछ दिन बनारस की सड़कों-हाटों में गमछे तक बेचे, मगर वाराणसी का स्नातक बन कर ही चैन लिया। छात्र भूगमल की अध्ययन के प्रति लगनशीलता देखकर, स्याद्वाद महाविद्यालय बनारस के अधिष्ठाता (पदाधिकारी) प्रसन्न होकर कहते कि भूरामलजी आप यह गमछे वगैरह बेचने का कार्य छोड़ दें, आपकी भोजन-संबंधी एवं अन्य व्यवस्था संस्था द्वारा कर दी जायेगी, तब वह मुस्कराकर कह देते कि आप ही ने तो सिखाया है- “सुखार्थी चेत् कुतो विद्या विद्यार्थी चेत् कुतो सुखम्”। (सुखार्थी के लिए विद्या कहाँ है, और विद्यार्थी के लिए सुख कहाँ है) सुनकर सब स्तब्ध रह जाते, और मन ही मन भूगमल के स्वाभिमान की प्रशंसा करते। कभी कभी यह भी सुनने मिलता-“सुखेन यत् प्राप्यते ज्ञानं, दुखे सति विलीयते” (सुख सुविधा) में जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है, वह थोड़े से दुख-संकट आने पर विलीन हो जाता है)।स्वाभिमानी रहकर ही श्री भूरामल ने बनारस में अध्ययन किया, यही कारण है कि दुख-संकटों में प्राप्त की हुई विद्या अन्त समय तक स्थिर रही और बिन्दु से सागर की तरह विराट होकर एक विद्यासागर दे गई। घर लौटते ही भूरामलजी को स्वतंत्र व्यवसाय में जुट जाना पड़ा किन्तु अध्ययन निरन्तर रखा और काव्य की सर्जना भी होने लगी।पोस्ट-108…शेषआगे…!!!
