समवशरण महामंडल विधान विश्व शांति महायज्ञ एवं आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन
बुंदेलखंड के प्राचीन एवं प्रसिद्ध जैन तीर्थ बंधाजी में दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर 170 मंडलीय समवशरण महामंडल विधान विश्व शांति महायज्ञ एवं आध्यात्मिक संस्कार शिविर का आयोजन मुनिश्री 108 विमल सागर सहित पंच मुनिराजों के सान्निध्य में किया जा रहा है । यह आयोजन 19 सितंबर तक चलेगा । जैन तीर्थ बंधाजी में रविवार को 10 धर्मों में तीसरा आर्जव धर्म मनाया गया । प्रातः 7.00 बजे शिविर में शामिल शिवरार्थियों एवं श्रद्धालुओं द्वारा श्रीजी का अभिषेक एवं शांति धारा की गई । श्रावक संस्कार शिविर में बुंदेलखंड के अनेक नगरों एवं गांव से सैकड़ों शिविरार्थी शामिल हुए हैं । दोपहर 1.00 बजे से समवशरण महामंडल विधान प्रारंभ हुआ । समवशरण में बैठकर इंद्र – इंद्राणी भक्तिभाव से भगवान की पूजन – अर्चना कर रहे हैं । बंधाजी में धरती पर स्वर्ग जैसा नजारा नजर आ रहा है । विधान में 3 मुख्य समवशरण की रचना की गई है । 167 छोटे समवशरण बनाए गए हैं । पंच मुनिराज समवशरण में बैठकर प्रवचन कर रहे हैं । मुनिश्री विमल सागर महाराज ने दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के ऊपर प्रवचन देते हुए कहा कि अनादिकाल से माया के कारण हम अपनी आत्मा को ठगते आए हैं , लेकिन लगता है कि हमने दूसरे को ठग लिया । वास्तव में हमने स्वयं को ठग लिया । ऐसा कब से करते आ रहे हैं अनंत भव हमारे निकल गए हैं । हमारे परिणामों में मन , वचन , काय से सरलता नहीं | आ रही है , तभी आ पाएगी , जब । हम संकल्पित हो जाएंगे मन , वचन , काय से मुझे इस को जीतना है । हमें सरल बनना है हमें किसी के साथ छल – कपट नहीं करना है । जब इस प्रकार के निरंतर भाव हमारे बनते हैं , तब थोड़ा अंतर हमारे भावों में हमारे परिणामों में आता है । मुनिश्री ने कहा कि जब एक पिता का बेटा दीक्षा धारण कर लेता है , 10 धर्मों को धारण कर लेता है , संयम के रास्ते पर चल पड़ता है , तब पिता को भी झुककर नमस्कार करना पड़ता है , यही आर्जव धर्म है । किसी के साथ छलपूर्वक कपटपूर्वक कोई कार्य नहीं करना चाहिए , तभी आर्जव धर्म की सार्थकता होगी ।
