विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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जुलूस के ओर-छोर देखते चल रहे महावीर प्रसाद उसे आँखों से पी जाते हैं। उन्हें याद आता है वह क्षण जब विद्याधर १५ के रहे होंगे। सदलगा का वह घर जहाँ किशोर विद्याधर अपने कक्ष में बैठे जोर-शोर से बारह भावना पढ़ रहे हैं, लोक भावना का पद कुछ धीरे से पढ़ते हैं, मगर स्वर साधकर-

मोह कर्म को नाश मेट कर सब जग की आशा
निज पद में थिर होय, लोक के शीश करो वासा॥

महावीर प्रसाद जी दरवाजे के पास खड़े चुपचाप सुन रहे हैं। पढ़ते पढ़ते विद्याधर आगे स्वयमेव बुदबुदाने लगते हैं। संसार में क्या रखा है? एक न एक दिन इसे छोड़ना ही होगा। अतः मैं स्वेच्छा से छोड़कर जंगल जाऊँगा साधु बनूँगा।

महावीर प्रसाद पूरी पंक्ति सुनकर चकित होते हैं। फिर कमरे में प्रवेश कर अनुज की हँसी उड़ाते हैं- ओ हो, तो भाईसाब साधु बनेंगे? अरे भैया क्या रखा है साधु बनने में? मजे से घर में रहो, आनन्द से भोजन करो, सुख से घूमो-फिरो, मेला-ठेला देखो, बस ठिठक गए विद्याधर उन्हें अग्रज का सम्बोधन रुचा नहीं। मौन रह गए। उनका वह मौन तब अग्रज महावीर प्रसाद जी न समझ सके थे, पर आज अजमेर की धरती पर उस मौन को पर्त दर पर्त खुलते देख रहे थे प्रकृति उन्हें दिखा रही थी।

आज वे मौन थे, हतप्रभ किशोरवय में भविष्यवाणी करने वाले विद्याधर समय के ऐरावत पर बैठकर साधु-पथ पर जा रहे थे और प्रौढ़ चिन्तन के अधिकारी अग्रज मौन होकर उन्हें देख रहे थे काश किशोर विद्याधर की बातों का मर्म तभी समझ लिया होता!

महावीरप्रसाद की आँखें निर्निमेष देखती रहती हैं एक प्यारी छवि। एक प्यारा जुलूस। एक प्यारा दृश्य दोपहर की सामायिक करके गुरु शिष्य नसियां जी के मंदिर में देवदर्शन कर और मांगलिक कार्य की सफलता की कामना कर, पाण्डाल में पहुँच जाते है।

पोस्ट-94…शेषआगे…!!!

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