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केशलुंचन पूर्ण होते ही पंडितों-श्रावकों और अपार जनसमूह के समक्ष गुरु ज्ञानसागर संस्कारित कर उन्हें दीक्षा प्रदान करते हैं।
विद्याधर वस्त्र छोड़ते हैं। तभी एक आश्चर्यकारी घटना घटती है। राजस्थान की जून माह की गरमी और खचाखच भरे पंडाल में २०-२५ हजार नर-नारी। समूचे प्रक्षेत्र पर तेज उमस हावी थी। लोग पसीने से नहा रहे थे। वातावरण ही जैसे भट्टी हो गया हो।
जैसे ही विद्याधर ने वस्त्र छोड़े, पता नहीं कैसे, कहाँ से बादल आ गए और पानी को भीनी-भीनी बौछार होने लगी हवाएँ ठण्डी हो पड़ीं। वातास शांति एवं ठण्डक देने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृतिः साक्षात् गोम्मटेश्वरी दिगम्बर मुद्रा का महामस्तकाभिषेक कर रही हो। अथवा देवों सहित इन्द्र ने ही आकर प्रथम अभिषेक का लाभ लिया हो।
कुछ समय बाद पानी रुक गया। सूर्य ने पुनः किरणें बिखेर दीं। सभी दंग रह गये, कहने लगे यह तो महान् पुण्यशाली विद्याधर जी की ही महिमा है। सभी अपने अपने मन गढ़ंत भाव लगाकर विद्याधर के पुण्य का बखान कर रहे थे। वहीं छोटे बालक कह रहे थे विद्याधर ने जैसे ही धोती खोली वैसे ही इन्द्र का आसन कांप गया सो उसने खुशी जताने के लिये नाच नाचकर यह वर्षा की है।
ज्ञानसागरजी पिच्छिका कमण्डलु सौंपते हुए और मुनिपद से संबंधित निर्देश देते हैं।
दीक्षा संपन्न।
