जबलपुर , अरविंद जैन बाकल । आचार्य श्री विद्यासागर महाराजजी के जबलपुर मे मंगल प्रवेश पश्चात आज आयोजित भव्य समारोह में आचार्य श्री के चातुर्मास कलश की स्थापना सानंद पूर्ण हुई है । इस मंगल अवसर पर अनेकों श्रद्धालु बंधुओं द्वारा मंगल कलश की स्थापना के साथ साथ कमेटी द्वारा 1000 सामान्य कलशों की स्थापना करने का निर्णय लिया गया है जिन्हें धर्म सभा में उपस्थित अनेक बंधुओं ने सानंद कलश स्थापना कर पुण्य लाभ कमाया । इस अवसर पर आचार्य ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि , दिगम्बर मुनि 4 माह के लिए एक स्थान पर सीमित साधनों से आत्म साधना का संकल्प लेते हुए समय व्यतीत करते हैं यह संकल्प हमने ले लिया है । अब आप भी संकल्प लें इन 4 माह में आत्म साधना करें और अहिंसा संकल्प का पालन करें । सुख , शांतिपूर्वक हिंसा से दूर रहे । हमें यह दुर्लभ जीवन मिला है हम इसका पालन शत प्रतिशत अहिंसा मार्ग अपनाकर करें और बच्चों को भी अच्छे संस्कार दें । माता – पिता के संस्कारों के कारण ही बच्चे संस्कारित होते है । आज छोटे – छोटे बच्चे संकल्पित होकर आहार देने को तत्पर होते है । यह आपके ही संस्कार हैं , बच्चों के चरित्र का प्रारंभ बचपन से होता है इनका आपको ध्यान रखना है । बच्चों का लालन पालन शाकाहारी और प्रभु आराधना वाले घर में हुई है इसीलिए यह बच्चे भी संस्कारित हुए है । बच्चों को जो संस्कार दिए जाते हैं वह आगे जाकर संसार के सामने सद्गुणों के साथ प्रकट होते हैं , यह बताते है कि धर्म क्या है और संस्कार क्या होते है । जब बच्चा 8 वर्ष का होता है और आपके साथ चलने लगता है तब से ही संस्कार की नींव रखी जाती है ।
आचार्य श्री जी ने हथकरघा द्वारा निर्मित वस्तुओं का महत्व बताते हुए कहा कि गांधी जी ने कहा था कि हथकरघा जीवन मंत्र है । आज अहिंसक रूप से निर्मित वस्त्र हथकरघा से ही निर्मित हो सकते हैं । दिव्यांग बंधु हथकरघा से ऐसी कलाओं का निर्माण कर रहे हैं जिस पर कोई विश्वास नहीं कर सकता । गांव की महिलाओं , बेटी हथकरघा की विश्व स्तरीय वस्तुओं का निर्माण कर रहे हैं और आत्म सम्मान प्राप्त कर रहे हैं । आचार्य श्री ने आयुर्वेद की मह पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आयुर्वेद 3000 से 4000 वर्ष पूर्व का ज्ञान है । यह आयुर्वेद के ग्रंथों में लिखा गया है और इसके प्रत्येक शब्द प्रत्येक लाइन पर उस समय शोध किया गया था , जो आज भी निरंतर जारी है । गत 2 वर्षों में जो महामारी आई उसमें भी आयुर्वेद की महत्ता प्रमाणित हुई है ।
आपके मन में अपनी समाज के लिए सहयोग की भावना जागृत होगी परंतु शायद हमारी यह आशा निरर्थक साबित हुई , अब हम यह विचार क्यों न करे कि हमने अपनी समाज के लिए क्या किया ? 12 वर्षों के उपरांत भी यदि आप 5100 या 2100 रुपये राशि सदस्यता के रुप में देने का मन नहीं बना पाते है तो आप ही सोचिए कि हम पत्रिका का संचालन आर्थिक सुदृढ़ता के अभाव में किस तरह से कर सकते है । ऐसा नहीं है , कि आपको पत्रिका सदस्यता शुल्क देने की जानकारी ना हो प्रेषित किए जाने वाले गोलालारीय दर्शन पत्रिका पर आपके पते के स्टीकर पर सदस्यता शुल्क की जानकारी अंकित रहती है । आज का गोलालारीय समाज 20 वर्ष पूर्व जैसा गोलालारीय समाज नहीं रहा है हमारे परिजनों की कड़ी मेहनत और श्रीजी के आशीर्वाद से अधिकतर परिवार बहुत संपन्न हो गये है । परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही है कई सक्षम व्यापारी हैं तो कई प्रतिष्ठित संस्थाओं में कार्यरत है फिर भी अपनी मातृसंस्था के प्रति हमारी सोच अभी भी बदल नहीं पा रही है इन संस्थाओं को सशक्त व आर्थिक रुप से सुदृढ़ बनाने के लिए हम अपना मन ही नहीं बना पाते है ? हमें अपने दिल पर हाथ रख यह विचार अवश्य करना चाहिए कि क्या गोलालारीय समाज के परिवारों को अपने समाज से कोई लगाव नहीं है ? क्या हम चाहते है कि समाज का एकमात्र मुखपत्र गोलालारीय दर्शन का प्रकाशन समाज हित में निरंतर होता रहे और सभी परिवारों तक पूर्वानुसार पत्रिका भेजी जाती रहे तो अब हमें अपने मन और मस्तिष्क को उदार कर आर्थिक सहयोग देने की पहल करना ही पड़ेगी । जिन परिवारों ने हम पर भरोसा रख आजीवन सदस्यता की राशि जमा कराई है हम उनके साथ धोखा नहीं कर सकते हैं पत्रिका को बीच में बंद कर उनके विश्वास को हम ठेस नहीं पहंचा सकते है । यही सोचकर हमने पत्रिका के लाभ से उन परिवारों को वंचित करने का फैसला किया है जिनके द्वारा नियमानुसार सदस्यता शुल्क जमा नहीं है यह सही भी है कि सुविधाओं का लाभ उन्हें ही प्राप्त होना चाहिए जिन्होंने सहयोग राशि दी हैं अन्यथा निःशुल्क व निरंतर पत्रिका भेजने वाली संस्थाएं या ता बीमार पड़ जाती है या वक्त से पहले ही खत्म हो जाती है । हम गोलालारीय समाज के इस सम्मान को ना तो बीमार पड़ने देना चाहते है और ना ही कभी खत्म होने देना चाहते है । यही कारण है कि हमने इतना कठोर कदम गोलालारीय दर्शन ‘ पत्रिकाको अमिट बनाने के लिए लिया है ।
– राजेन्द्र जैन ‘ बागों
