● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●
Day 17 : : तत्त्वसार गाथा 32 – 33
ग्रंथकार- आचार्य देवसेन स्वामी
प्रस्तुति- डॉ. पुलक गोयल, जबलपुर
मण-वयण-काय-रोहे
रुज्झइ कम्माण आसवो णूणं।
चिर-बद्धं गलइ सयं
फल-रहियं जाइ जोईणं।।32।।
ण लहइ भव्वो मोक्खं
जाव य पर-दव्व-वावडो चित्तो।
उग्ग-तवं पि कुणंतो
सुद्धे भावे लहुं लहइ।।33।।
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तत्त्वसार | आचार्य देवसेन स्वामी | द्रव्यानुयोग | गाथा 01-74 | शुद्ध पाठ | शब्दार्थ | व्याकरणिक विश्लेषण | व्याख्या | डॉ. पुलक गोयल :
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