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पीड़ाकाराजकुमार :
एक दिन की बात। रात को वे गुरुवर ज्ञानसागरजी को लघुशंका से निवृत्त कराकर लौट ही रहे थे कि एक बिच्छू ने उनके चरण स्पर्श कर लिए। बिच्छू तो धन्य हो गया, पर विद्याधरजी पीड़ा के सागर में डूबने उतराने लगे।
उन्होंने गुरुजी को यथा स्थान पहुँचा दिया, उसके बाद बिच्छू द्वारा दिए गए कष्ट को सहने का रास्ता खोजने लगे। पीड़ा ने उन्हें निरुपाय बना दिया था। ज्ञानसागरजी ने अन्य शिष्यों को संकेत दिया कि श्रावकों को खबर कर दो ताकि कुछ अनुकूल चिकित्सा हो सके और लम्बी की पीड़ा कम की जा सके। परन्तु तपस्वी विद्याधर जी ने आदरपूर्वक मना कर दिया।
वे दूसरे कमरे में जा पीड़ा को आत्मसात कर भक्तामर स्तोत्र का उच्चारण करने लगे। भक्तामर स्तोत्र का पाठ पूरी रात चला और टहलते टहलते ही निकाल दी वह लम्बी रात उन्होंने उनके इस दृढ़-भाव से क्षुल्लकों और ब्रह्मचारियों को शिक्षा मिली सो मिली, गुरु ज्ञानसागर की आँखों में भी नया बोध जागा यह महान् तपस्वी बनेगा भविष्य में इसकी सहनशक्ति अपार है।
उपसर्गों को हँसकर सहने वाले ब्रह्मचारी जी जन-जन के मन में निष्ठा, दृढ़ता और अडिगता के भाव भर रहे थे, बिच्छू तो मात्र निमित्त था शिक्षा प्रदान करने का।
बिच्छू के जहर की पीड़ा तीन दिन तक रही। शरीर तड़पता रहा, पर आत्मा केन्द्रित रही।
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