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अजमेरकाअपनत्व:
अजमेर में उन दिनों त्याग बरस रहा था, वहाँ हर प्राण विद्याधर को गहराई से जानने लगा था, त्याग की परिभाषा समझाने लगा था।
ज्ञानीजन आपस में चर्चा करते रहते। एक कहता-तप-सेवा-निष्ठा और ज्ञान को एक मूर्त्य देखना हो, ‘फोर इन वन’ तो देखो विद्याधर को कोई कहता यौवन को पराजित करने वाले बालब्रह्मचारी को देखना हो तो देखिए विद्याधर को…।
विद्याधर की चर्चाएँ आम हो गईं। पर अजमेर की आँखों में सदलगा की आँखों की तरह कुछ खो देने का पश्चाताप या दुख नहीं था, बल्कि कुछ श्रेष्ठ पा जाने का गौरव था। आ गया था एक उजास सभी की दैनिक चर्या में यहाँ।
मुनि संघ की विशेष चर्याएँ चातुर्मास स्थापना से प्रारम्भ हो चुकी थीं। विद्याधर जी के लिए तपस्या और गुरुसेवा ही प्रमुख कार्य थे। वे गुरु की छाया बनकर कार्य करते थे।
पोस्ट-84…शेषआगे…!!!
