शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
यात्रियों के पत्र, संदेश एवं सदलगा के श्रावकों की चर्चा से, विद्याधर के माता-पिता को राहत मिलती थी जी करता, कहीं न कहीं से समाचार मिलते ही रहें। कोई विद्या की चर्चा करता ही रहे।
अजमेर जाने की तैयार में सभी रहते। माता-पिता तो चाहे जब कहते- तीर्थ को जाना है। पर पारिवारिक विसंगतियाँ उन्हें पग न बढ़ाने देती । शिवकुमार और तम्हा भी अजमेर जाने का मन्तव्य व्यक्त कर चुके थे पर परिस्थितियों के शिकार वे भी हो जाते। जब कोई न निकल पाता तो मारुति कहता- मुझे रास्ता समझा दो मैं चला जाता हूँ। पर अकेले वह भी न निकल पाता, किसी के साथ की प्रतिक्षा में बैठा रहता।
मारुति की हृदयगत छटपटाहट महावीर बाबू जानते थे। उनकी दृष्टि में मारुति उनके परिवार का आज्ञाकारी विश्वस्त कर्मचारी भर न था, वह था विद्याधर के बाल्यकाल का सखा। हाँ जैसे कृष्ण के सखा सुदामा थे। मारुति की पूछ इसीलिए कुछ अधिक ही होती थी परिवार में।
शान्ता और सुवर्णा सोचती कि चार दिन के लिए उन्हें पंख ऊग आते तो उड़कर चली जाती विद्याधर योगी के पास। वे इतनी अल्पवयस्क थीं कि स्वतंत्रता से आने-जाने की बात कह ही न सकती थीं।
सदलगा के मंदिरों में शास्त्र प्रवचन के पश्चात् अक्सर विद्याधर की चर्चाएं छिड़ जातीं। तब लोग अपना-अपना नैकट्य खुले मुँह बखान करते थे आपस में। जिसके घर एक बार भी, कभी विद्याधर गए होंगे, वे कहते वह तो मेरे यहाँ आते ही रहते थे, बड़ा उठना-बैठना होता था उनके साथ। दूसरा कहता- मेरे यहाँ हर हफ्ते आते थे। तीसरा नहले पर दहला मार देता मेरे घर तो हफ्ते में दो बार आते थे।
ममत्व की बौछार का मजा भी विचित्र होता है। लोग मंदिर में बैठकर मोह युक्त चर्चाएं करते। चर्चाओं में अतिशयोक्तियाँ ले आते। पहले से बढ़कर दूसरा और दूसरे से बढ़कर तीसरा विद्याधर से अपनी प्रगाढ़-मैत्री व समीपता ज्ञापित कर देता। आनन्द तो तब बढ़ गया एक दिन जब एक सज्जन लबक में कह पड़े विद्या तो मेरे यहाँ प्रायः रोज आते रहते थे।
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