विद्याधर से विद्यासागर

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विद्याधर से विद्यासागर

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कहाँमिलेगेगुरुनाथ !

कुछ ही समय बाद गाड़ी आ गई। विद्याधर रवाना हो गए। यात्रा प्रारम्भ। खिड़कियों से संसार के दृश्य देखते हुए वे जा पहुँचे राजस्थान के उस ऐतिहासिक नगर में, जिसे अजमेर कहते हैं। वह कोई जुलाई ६७ का समय था। वहाँ भी जनजन से पूजित दो चरण थे, पू॰ ज्ञानसागरजी मदनगंज किशनगढ़ में जो अवस्थित थे, वहाँ भी रज थी। जरूरत थी एक लग्नशील अध्यवसायी शिष्य की।

विद्याधर को उनके चरणों की भनक पड़ गई थी हृदयमन में दो उपवास झेलने के बाद मिला था अजमेर वे सातवीं प्रतिमाधारी थे। रेल यात्रा में देव दर्शन एवं शुद्ध आहार की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें दो दिन तक निर्जला उपवास करने पड़े थे। जैन मंदिर में पहुँचे। एक व्यक्ति से पूछा- पू० ज्ञानसागर महाराज कहाँ मिलेंगे। व्यक्ति, व्यक्ति था। अतः उसने मुनि का पता न बताकर एक अन्य व्यक्ति का पता बता दिया, कहने लगा ये पास में कजौड़ीमलजी रहते हैं, गुरुवर के भक्त हैं… उनसे बात कर लो।

विद्याधर श्री कजोड़ीमलजी के निवास पर पहुँचे। अभिवादन की भावभंगिमा निःसृत हुई दोनों ओर से फिर परिचय दिया विद्याधर ने अपना कजौड़ीमलजी हतप्रभ रह गये जब उन्हें मालूम हुआ कि ढाई दिन से निराजल विद्याधर खड़े हैं उनके निवास पर…।

पोस्ट-67…शेषआगे…!!!

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