विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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वहअध्ययनशीलशिष्य :

एक दिन विद्या की प्यासी दृष्टि ज्ञानसागरजी के देह के भूगोल को, दक्षिणध्रुव से उत्तर ध्रुव की ओर पढ़ती हुई रुक गई उनके नेत्रों पर जाकर गुरु ने भी विद्या के नेत्र देखे। देखकर उन नेत्रों की चाह समझने की कोशिश करने लगे। उनने उन मोतियों में देखा कि ये जिनवाणी माता के चरणों में अर्घ्य की तरह चढ़ जाने आकुल-व्याकुल हैं। उन्होंने समीप ही रखा ग्रन्थ उठाया और विद्या को दे दिया। बोले केवल इतना “ तुझे अब पढ़ाता हूँ।”

ग्रन्थ के ऊपर दृष्टिपात की विद्या ने लिखा था- ‘सर्वार्थसिद्धि ।’ पूज्यपाद स्वामी का वह महान् ग्रन्थ विद्या के हाथों में खिल उठा। उसे पुष्प की तरह संभालकर ले आये, अपनी बाजौट पर, हो गया अध्ययन शुरू।

जो श्रम देते थे सेवा में, वह ही, वैसा ही देने लगे अध्ययन में विद्या पढ़ते। गुरु पढ़ाते।

बीतने लगी उम्र सही मार्ग पर विद्या हो गये गुरु ज्ञानसागर के पथानुगामी पथ के पुष्प गुरु चरणों पर चढ़ाते, शूल स्वतः स्वीकार कर लेते।

कुछ ही दिनों बाद गुरुवर ने जैनाचार्य की महान् रचना ‘कातन्त्र रूपमाला’ पढ़ा दी विद्या को इस ग्रन्थ को पढ़ने-समझने-सोचने में साधारण विद्यार्थियों को एक से दो वर्ष का समय लग जाता है, पर छात्र विद्या को लगे मात्र छह माह मेधावी छात्र को पाकर गुरु उसी तरह गद्गद् होता है जिस तरह व्यापारी खरी मुनाफा को पा ।

विद्या की मेधा छुपी नहीं रह सकती थी, वह धूप की तरह नित- नित चमकती और गुरुवर का हृदय आकाश उसकी चमक से आलोकित हो जाता, गुरुवर की मुस्कान बरसने लगती विद्या पर।

‘ब्रह्मचारी विद्याधर’ गुरु तो गुरु, हर आने जाने वाले श्रावक के मन तक उतर गये। वे सभी को प्यारे लगने लगे। समाज के दुलारे हो पड़े। हर श्रावक प्रश्न खोजता उनसे कुछ बात करने के लिए। जो श्रावक मुनि श्री ज्ञानसागरजी के ज्ञान से प्रभावित थे, वे उनके जीवंत ज्ञानपिण्ड, प्रिय शिष्य, विद्याधर से भी उतने ही प्रभावित होने लगे। वे हो गये अजमेर समाज के समक्ष ज्ञानपिण्ड, सेवापिण्ड और तपस्यापिण्ड के प्रतीक तीन तत्त्वों के महापिण्ड उनसे कई व्यक्ति प्रश्नों के बहाने बात करना चाहते थे पर विद्याधर किसी को अवसर ही न देते।

पोस्ट-76…शेषआगे…!!!

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